एक छोटे से कस्बे में, चाय की एक पुरानी सी दुकान थी। वहां की चाय इतनी लाजवाब थी कि लोग दूर-दूर से उसे चखने आते थे। लेकिन इसकी असली खासियत थी वहां की दादीजी, जिनके पास हर किसी के लिए एक कहानी होती थी। शहर की भागदौड़ से थक चुका राहुल भी एक दिन वहां पहुंचा। चाय की चुस्कियों के साथ दादीजी की कहानियों ने उसे बांध लिया। राहुल को अपने सवालों के जवाब मिलने लगे।
एक हंसमुख दुकानदार गिरिजा भी उसी दुकान पर रोज चाय पीने आती थी। उसकी मेहनत और सकारात्मकता देखकर राहुल को जीवन का एक नया नजरिया मिला। राहुल धीरे-धीरे खुद को बदलने लगा। वो दुकान की मदद करने लगा, गिरिजा से व्यापार के गुर सीखने लगा।
एक दिन, एक रहस्यमयी संत “राजा बाबा” दुकान पर आए। उनकी बातों में गूढ़ ज्ञान छिपा था। उन्होंने राहुल को बताया कि सच्ची खुशी अपने भीतर ही मिलती है। राहुल ने संत से प्रभावित होकर उनके साथ रहने का फैसला किया।
राहुल, दादीजी की कहानियों से सीखे पाठ, गिरिजा से मिले व्यावहारिक ज्ञान और संत के गूढ़ उपदेशों को लेकर एक नई यात्रा शुरू करता है। वो लोगों की मदद करता है, कहानियां सुनाता है और सबको खुशियां बांटता है। वो समझता है कि सच्ची खुशी दूसरों की खुशी में छिपी है।
नैतिक शिक्षा। यह कहानी जीवन के मायने ढूंढने, खुद को बदलने और दूसरों की मदद करने के बारे में है। कहानी के माध्यम से बताया गया है कि जीवन की सच्ची खुशी छोटी-छोटी चीजों में, रिश्तों में, दूसरों की मदद करने में और अपना उद्देश्य खोजने में है।
