गाँव के बाहर एक छोटी सी झोपड़ी में रहने वाला एक लड़का, राहुल, बहुत ही मेहनती और ईमानदार था। उसका सबसे अच्छा दोस्त, मोहन, गाँव के अमीर जमींदार का बेटा था। दोनों की दोस्ती बचपन से थी, लेकिन उनकी जिंदगी के हालात बिल्कुल अलग थे। राहुल गरीब था, जबकि मोहन के पास सब कुछ था। फिर भी, उनकी दोस्ती में कभी कोई फर्क नहीं आया।
एक दिन, गाँव में एक बड़ा मेला लगा। मोहन ने राहुल को मेले में चलने के लिए कहा। राहुल ने मना कर दिया, क्योंकि उसके पास मेले में खर्च करने के लिए पैसे नहीं थे। मोहन ने कहा, “चिंता मत करो, मैं सबका खर्च उठाऊंगा।” राहुल ने हिचकिचाते हुए हाँ कह दी।
मेले में दोनों ने खूब मस्ती की। वे झूले पर झूलें, खेल खेले और खाने-पीने का आनंद लिया। लेकिन जब मेला खत्म हुआ, तो मोहन ने राहुल से कहा, “तुमने मेरे साथ इतना मजा किया, लेकिन तुमने मेरे लिए क्या किया?” राहुल चुप रहा। उसके पास जवाब नहीं था।
कुछ दिनों बाद, गाँव में एक बड़ी प्रतियोगिता हुई। इसमें गाँव के सभी युवाओं को भाग लेना था। प्रतियोगिता का विषय था – “सच्ची मित्रता”। मोहन ने सोचा कि वह इस प्रतियोगिता को आसानी से जीत लेगा, क्योंकि उसके पास सब कुछ था। उसने एक भव्य भाषण तैयार किया, जिसमें उसने अपनी दोस्ती के बारे में बताया।
राहुल ने भी प्रतियोगिता में भाग लेने का फैसला किया। उसने कोई भाषण नहीं लिखा, बल्कि अपने दिल की बात कहने का फैसला किया। जब उसकी बारी आई, तो उसने कहा, “मित्रता का मतलब यह नहीं है कि आपके पास क्या है, बल्कि यह है कि आप किसके साथ हैं। मेरे पास कुछ नहीं है, लेकिन मेरा दोस्त मोहन मेरे साथ है। वह मेरी खुशी और दुख का साथी है। यही सच्ची मित्रता है।”
राहुल की बात सुनकर सभी हैरान रह गए। मोहन को एहसास हुआ कि उसने गलत सोचा था। उसने राहुल से माफी मांगी और कहा, “तुम सही हो, दोस्ती का मतलब धन या सुख-सुविधाएं नहीं है, बल्कि एक-दूसरे के साथ खड़े रहना है।”
प्रतियोगिता में राहुल को पहला पुरस्कार मिला, लेकिन उससे भी बड़ी बात यह थी कि उसकी और मोहन की दोस्ती और मजबूत हो गई।
नैतिक शिक्षा। सच्ची मित्रता धन या सुख-सुविधाओं पर नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति विश्वास और समर्थन पर टिकी होती है। दोस्ती में ईमानदारी और सच्चाई सबसे महत्वपूर्ण होती है।
