बनारस के एक छोटे से गाँव में एक गरीब लड़का रहता था जिसका नाम राजू था। राजू की माँ उसे बहुत संजीवनी वटी बनाने का कला सिखाई थीं। वह छोटा होने के बावजूद बहुत मेहनती और उत्साही था।
एक दिन, गाँव में एक बड़ा मेला आया। राजू ने देखा कि बाजार में बनारसी बूटियों की बहुत मांग है। वह तय करता है कि वह भी बनारसी बूटियाँ बनाएगा और उन्हें बेचकर पैसे कमाएगा।
राजू ने अपनी माँ से कुछ पैसे मांगे और बूटियों की तैयारी में लग गया। उसने बहुत सुंदर बूटियाँ बनाई और मेले में बेचने के लिए ले गया।
मेले में लोग राजू की बूटियों को बहुत पसंद करते हैं और वह जल्दी ही सभी बूटियाँ बेच देता है। राजू बहुत खुश होता है क्योंकि उसने मांगे पैसे भी कमा लिए और लोगों को भी खुश किया।
फिर एक बुढ़े आदमी ने राजू से पूछा, “तुम इतने छोटे कैसे होकर इतने सुंदर बूटियाँ बना सकते हो?”
राजू हंसते हुए जवाब देता है, “मैंने नहीं, मेरी माँ ने मुझे सिखाया है कि हमारा काम इतना भी छोटा नहीं होता, जितना हमारी मेहनत बड़ी होती है।”
नैतिक शिक्षा। इस कहानी से हमें यह सिखने को मिलता है कि किसी भी काम का महत्व उसमें लगे हुए मेहनत और समर्पण में होता है। राजू ने दिखाया कि छोटे आयु में भी हम अपने क्षमताओं का सही उपयोग करके महत्वपूर्ण कार्यों को कर सकते हैं।
