साथ का सफर

उत्तराखंड के एक छोटे से पहाड़ी गाँव, अल्मोड़ा, में बसी थी लक्ष्मी। लक्ष्मी की उम्र थी करीब पैंतीस साल, और वह गाँव में अपनी सादगी और मेहनत के लिए जानी जाती थी। उसका घर एक छोटी-सी पहाड़ी पर था, जहाँ से हिमालय की बर्फीली चोटियाँ साफ दिखाई देती थीं। लक्ष्मी की जिंदगी आसान नहीं थी। उसके पति, मोहन, एक मजदूर थे, जो गाँव से दूर शहर में काम करते थे। साल में एक-दो बार ही घर लौट पाते थे। लक्ष्मी अपने दो बच्चों, बारह साल की रिया और आठ साल के सोनू, के साथ अकेले गाँव में रहती थी।

लक्ष्मी का दिन सुबह जल्दी शुरू होता। वह अपने छोटे से खेत में काम करती, गाय का दूध निकालती, और फिर बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करती। गाँव का स्कूल पहाड़ी के नीचे था, और रिया व सोनू को वहाँ पहुँचने के लिए लंबा रास्ता तय करना पड़ता। लेकिन स्कूल की हालत अच्छी नहीं थी। इमारत पुरानी थी, किताबें कम थीं, और शिक्षकों की कमी के कारण बच्चों की पढ़ाई अधूरी रहती थी। लक्ष्मी को यह बात बहुत परेशान करती थी। वह चाहती थी कि उसके बच्चे पढ़-लिखकर एक बेहतर जिंदगी जिएँ, लेकिन गाँव की सीमित सुविधाएँ उसके सपनों के आड़े आ रही थीं।

एक दिन, गाँव में एक नया मेहमान आया, डॉ. अनिल। वह एक सेवानिवृत्त शिक्षक थे, जो शहर की भागदौड़ से तंग आकर अल्मोड़ा में शांति की तलाश में आए थे। डॉ. अनिल ने गाँव के स्कूल की हालत देखी और लक्ष्मी से मुलाकात की। लक्ष्मी ने अपनी चिंता उनके सामने रखी, “साहब, हमारे बच्चों का भविष्य अंधेरे में है। स्कूल में न तो अच्छे शिक्षक हैं, न ही किताबें। मैं चाहती हूँ कि मेरे बच्चे पढ़ें, लेकिन मेरे पास साधन नहीं हैं।”

डॉ. अनिल ने लक्ष्मी की बात सुनी और गाँव के बच्चों के लिए कुछ करने का फैसला किया। उन्होंने लक्ष्मी और गाँव के कुछ अन्य माता-पिताओं को इकट्ठा किया और एक छोटी-सी लाइब्रेरी शुरू करने की योजना बनाई। लक्ष्मी को यह विचार थोड़ा अटपटा लगा। “हमारे पास पैसे कहाँ हैं, साहब? और कौन किताबें पढ़ेगा?” उसने पूछा। लेकिन डॉ. अनिल ने हौसला दिया, “लक्ष्मी जी, शुरुआत छोटी हो सकती है। अगर हम सब मिलकर कोशिश करें, तो कुछ न कुछ जरूर होगा।”

डॉ. अनिल ने अपने पुराने दोस्तों और शहर के कुछ स्कूलों से संपर्क किया। उन्होंने पुरानी किताबें, स्टेशनरी, और कुछ बेंच-डेस्क का इंतजाम किया। लक्ष्मी ने अपने घर के एक छोटे से कमरे को लाइब्रेरी के लिए खाली किया। गाँव के कुछ युवाओं ने दीवारों पर रंग किया, और बच्चों ने मिलकर किताबों को व्यवस्थित किया। जल्द ही, “हिमालय पुस्तकालय” नाम की यह छोटी-सी लाइब्रेरी गाँव के बच्चों के लिए एक नया ठिकाना बन गई।

रिया और सोनू सबसे उत्साहित थे। रिया को विज्ञान की किताबें पढ़ने का शौक था, और वह हर शाम लाइब्रेरी में समय बिताती। सोनू को कहानियों की किताबें पसंद थीं, और वह अक्सर लक्ष्मी को नई-नई कहानियाँ सुनाता। लेकिन लक्ष्मी का सबसे बड़ा बदलाव तब आया, जब उसने खुद पढ़ना शुरू किया। डॉ. अनिल ने उसे प्रोत्साहित किया कि वह भी कुछ सीखे। लक्ष्मी ने धीरे-धीरे अक्षर पहचानना शुरू किया, और जल्द ही वह बच्चों की किताबें पढ़ने लगी। यह देखकर रिया और सोनू को बहुत खुशी हुई। वे अपनी माँ को “मम्मी टीचर” कहकर चिढ़ाते और हँसते।

गाँव में बदलाव की लहर चल पड़ी। लाइब्रेरी न सिर्फ़ बच्चों के लिए, बल्कि बड़ों के लिए भी एक जगह बन गई, जहाँ वे पढ़ने, सीखने और बातचीत करने आते। लक्ष्मी ने गाँव की अन्य महिलाओं को भी प्रेरित किया कि वे अपने बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान दें। धीरे-धीरे, गाँव के लोग एक-दूसरे की मदद करने लगे। कोई किताबें दान करता, तो कोई बच्चों को पढ़ाने में मदद करता।

एक साल बाद, रिया ने जिला स्तर की एक विज्ञान प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और दूसरा स्थान हासिल किया। जब वह मंच पर पुरस्कार लेने गई, तो उसने अपनी माँ और डॉ. अनिल को धन्यवाद दिया। उस दिन लक्ष्मी की आँखों में आँसू थे, लेकिन वे गर्व के आँसू थे। उसने महसूस किया कि उसकी छोटी-सी कोशिश ने न सिर्फ़ उसके बच्चों का भविष्य बदला, बल्कि पूरे गाँव को एक नई रोशनी दी।

नैतिक शिक्षा। यह कहानी हमें सिखाती है कि शिक्षा और सामुदायिक सहयोग किसी भी मुश्किल को पार कर सकता है। छोटी-छोटी कोशिशें, अगर दिल से की जाएँ, तो बड़े बदलाव ला सकती हैं। हमें अपने सपनों और अपने समुदाय के लिए हमेशा एक कदम आगे बढ़ाना चाहिए।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

© 2026 Hindi Kisse Kahaniyan