एक छोटी सी आशा

राजस्थान के एक छोटे से गाँव, बाड़मेर, में रेगिस्तान की तपती धूप के बीच बसी थी मंजू। मंजू की उम्र करीब तीस साल थी, और वह अपने गाँव में अपनी परिश्रमी और खुशदिल स्वभाव के लिए जानी जाती थी। उसका घर मिट्टी का बना था, जिसके बाहर एक छोटा-सा आँगन था, जहाँ वह अपने तीन बच्चों, दस साल की पूजा, आठ साल के राहुल, और पाँच साल की छोटी रानी के साथ समय बिताती थी। मंजू के पति, गोपाल, एक ट्रक ड्राइवर थे, जो हफ्तों तक घर से दूर रहते। घर की सारी जिम्मेदारी मंजू के कंधों पर थी।

बाड़मेर में पानी की कमी एक बड़ी समस्या थी। गाँव के लोग दूर-दूर से पानी लाने के लिए मजबूर थे। मंजू हर सुबह अपने बच्चों के साथ मटके लेकर दो किलोमीटर दूर एक कुएँ तक जाती। यह काम आसान नहीं था। गर्मी में रेत पर चलना, भारी मटके उठाना, और फिर बच्चों की देखभाल करना, यह सब मंजू के लिए रोज़ की चुनौती थी। लेकिन मंजू कभी शिकायत नहीं करती थी। वह अपने बच्चों को हँसाने के लिए रास्ते में कहानियाँ सुनाती, और उन्हें सिखाती कि परिश्रम से हर मुश्किल को जीता जा सकता है।

गाँव में एक और समस्या थी, लड़कियों की पढ़ाई। कई परिवार अपनी बेटियों को स्कूल भेजने से कतराते थे। पूजा को पढ़ने का बहुत शौक था, लेकिन गाँव के कुछ लोग कहते, “लड़की को इतना पढ़ाने से क्या फायदा? उसे तो शादी करनी है।” मंजू को ये बातें चुभती थीं। वह चाहती थी कि उसकी बेटी पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो। लेकिन स्कूल की फीस और किताबों का खर्च मंजू के लिए एक बड़ा बोझ था।

एक दिन, गाँव में एक गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) की टीम आई। इस टीम की अगुवाई कर रही थीं शालिनी, एक युवा समाजसेविका। शालिनी ने गाँव की समस्याओं को समझने के लिए लोगों से मुलाकात की। जब वह मंजू से मिली, तो मंजू की परिश्रम और बच्चों के प्रति उसका समर्पण देखकर प्रभावित हुई। मंजू ने अपनी चिंता शालिनी से साझा की, “मैं चाहती हूँ कि मेरी पूजा पढ़े, लेकिन पानी लाने और घर के कामों में इतना समय चला जाता है कि स्कूल भेजना मुश्किल हो रहा है।”

शालिनी ने गाँव में पानी की समस्या को हल करने के लिए एक योजना बनाई। उन्होंने गाँव के पास एक छोटा-सा जलाशय बनवाने का प्रस्ताव रखा, जिसमें बारिश का पानी इकट्ठा किया जा सके। इसके लिए गाँव वालों का सहयोग जरूरी था। मंजू ने इस काम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उसने गाँव की महिलाओं को एकजुट किया और सभी ने मिलकर श्रमदान किया। बच्चे भी उत्साह से शामिल हुए। राहुल और छोटी रानी मिट्टी ढोने में मदद करते, और पूजा गाँव वालों को प्रेरित करने के लिए छोटे-छोटे गीत गाती।

कई महीनों की परिश्रम के बाद जलाशय तैयार हो गया। अब गाँव वालों को पानी के लिए इतनी दूर नहीं जाना पड़ता था। मंजू को अब अपने बच्चों के साथ ज्यादा समय मिलने लगा। शालिनी ने गाँव में एक छोटा-सा शिक्षण केंद्र भी शुरू किया, जहाँ बच्चे मुफ्त में पढ़ सकते थे। मंजू ने पूजा को इस केंद्र में भेजना शुरू किया, और खुद भी शाम को वहाँ जाकर कुछ सीखने लगी। उसने सिलाई का काम सीखा और धीरे-धीरे गाँव में साड़ियों और कपड़ों की सिलाई शुरू की। इससे उसकी आमदनी बढ़ने लगी।

लेकिन मंजू की सबसे बड़ी जीत तब हुई, जब पूजा ने शिक्षण केंद्र की एक कविता प्रतियोगिता में पहला पुरस्कार जीता। पूजा ने अपनी कविता में पानी की अहमियत और अपनी माँ की परिश्रम की कहानी बयान की। जब पूजा मंच पर अपनी कविता पढ़ रही थी, मंजू की आँखें नम थीं। उसने महसूस किया कि उसकी छोटी-सी कोशिश ने न सिर्फ़ उसके परिवार की जिंदगी बदली, बल्कि पूरे गाँव को एक नई उम्मीद दी।

गाँव में अब हर घर में पानी की बात होती, और लड़कियों की पढ़ाई को भी महत्व दिया जाने लगा। मंजू गाँव की दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणा बन गई। उसने सिखाया कि एक छोटी-सी आशा भी, अगर परिश्रम और एकजुटता के साथ पाली जाए, तो बड़े बदलाव ला सकती है।

नैतिक शिक्षा। यह कहानी हमें सिखाती है कि मुश्किल परिस्थितियों में भी हिम्मत और सामूहिक प्रयास से बदलाव संभव है। छोटे-छोटे कदम, अगर सही दिशा में उठाए जाएँ, तो समाज को नई रोशनी दे सकते हैं। हमें अपने बच्चों के सपनों को पंख देना चाहिए और समुदाय के साथ मिलकर हर चुनौती का सामना करना चाहिए।

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