चालाक कौआ और आलसी सियार

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एक हरे-भरे जंगल में, जहाँ सूरज की किरणें पत्तों के बीच से झांकती थीं और हवा में फूलों की खुशबू तैरती थी, एक चालाक कौआ रहता था, जिसका नाम था काला। काला अपनी बुद्धिमानी और सुझ-बुझ से सभी जानवरों का सम्मान पाता था। उसी जंगल में एक आलसी सियार रहता था, जिसका नाम था ढीला। ढीला दिनभर सोता था और दूसरों पर निर्भर रहता था, क्योंकि उसे मेहनत करना पसंद नहीं था।

एक बार जंगल में सर्दी का मौसम आया। ठंडी हवाएँ चलने लगीं, और पेड़ों पर फल कम हो गए। जानवरों ने मिलकर भोजन जमा करना शुरू कर दिया, लेकिन ढीला बस इधर-उधर घूमता और कहता, “मुझे भूख लगी, कोई मुझे खाना दे दे!” काला, जो यह सब देख रहा था, ने सोचा कि ढीला को मेहनत का महत्व सिखाना जरूरी है।

एक दिन, काला ने एक योजना बनाई। उसने जंगल के एक कोने में एक बड़ा आम का पेड़ देखा, जिस पर अभी भी कुछ पके आम लटक रहे थे। काला ने जोर से चिल्लाया, “देखो, वहाँ स्वादिष्ट आम हैं! लेकिन इन्हें लेने के लिए किसी को पेड़ पर चढ़ना होगा।” ढीला, जिसकी आँखों में लालच चमक उठा, तुरंत बोला, “मैं लूँगा! लेकिन कोई और चढ़े, मैं नीचे से ले लूँगा।”

काला ने मुस्कुराते हुए कहा, “ठीक है, लेकिन पहले तुम्हें एक शर्त माननी होगी। तुम्हें पेड़ के नीचे एक घंटा मेहनत करनी होगी—पत्ते इकट्ठे करने हैं। फिर मैं तुम्हारे लिए आम तोड़ दूँगा।” ढीला अनमने ढंग से राजी हो गया, क्योंकि उसकी भूख उसे मजबूर कर रही थी। उसने आधे घंटे तक पत्ते इकट्ठे किए, लेकिन फिर थककर बैठ गया और बोला, “बस, अब और नहीं!”

काला ने ऊपर से एक आम तोड़ा और उसे ढीले की ओर फेंका, लेकिन आम एक कांटे वाली झाड़ी में फंस गया। काला बोला, “अब तुम्हें खुद उस झाड़ी से आम निकालना होगा, क्योंकि मेहनत के बिना फल नहीं मिलता।” ढीला कोशिश करने लगा, लेकिन कांटों से बचने के चक्कर में वह और गंदा हुआ। आखिरकार, उसने हार मान ली और काले से मदद माँगी।

काला ने कहा, “ढीला भाई, मेहनत से ही जीवन में सफलता मिलती है। अगर तुम आलस छोड़ दो, तो जंगल में सब तुम्हारी मदद करेंगे।” ढीला को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने वादा किया कि वह अब मेहनत करेगा। अगले दिन से, ढीला ने अपने लिए भोजन जमा करना शुरू कर दिया और जंगल के अन्य जानवरों के साथ मिलकर काम करने लगा।

नैतिक शिक्षा: आलस जीवन को मुश्किल बनाता है; मेहनत से ही सच्चा सुख और सम्मान मिलता है।

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