रिक्शा, रोटी और रंगीन सपने

मुंबई की धड़कन कभी नहीं रुकती। सुबह के पहले उजाले से लेकर रात के आखिरी साये तक, शहर की सड़कें लोगों, गाड़ियों और सपनों से भरी रहती हैं। इन्हीं सड़कों के बीच, धारावी की तंग गलियों में, रहता था मोहन, एक रिक्शा चालक, जिसका जीवन सूरज की तरह उगता और ढलता था। उसका छोटा-सा घर, जो दो कमरों से ज्यादा कुछ नहीं था, मिट्टी और पसीने के परिश्रम से बना था। दीवारों पर सीलन की परछाइयाँ थीं, और छत पर टीन की चादर बारिश में टपकती थी। फिर भी, उस घर में प्यार और उम्मीद की गर्माहट थी।

मोहन की सुबह शुरू होती थी राधा के हाथ की चाय की चुस्कियों से। राधा, उसकी पत्नी, एक साधारण-सी औरत थी, जिसके चेहरे पर परिश्रम की लकीरें थीं, पर आँखों में बच्चों के लिए चमक। वह सुबह-सुबह पड़ोस की औरतों के लिए सिलाई का काम करती थी, ताकि घर का खर्च चल सके। मोहन हर दिन अपनी रिक्शा लेकर निकलता, सड़कों पर यात्रियों को ढोता, और रात को थककर घर लौटता। उसका सपना था कि उसका बेटा अर्जुन और बेटी सावित्री पढ़-लिखकर कुछ बनें, ताकि उन्हें उसकी तरह पसीना नहीं बहाना पड़े।

“राधा, आज अर्जुन का स्कूल का फॉर्म भरने की आखिरी तारीख है। मैंने कुछ पैसे जोड़े हैं, बाकी तू देख ले,” मोहन ने एक सुबह राधा से कहा, अपनी रिक्शा को पोंछते हुए। राधा ने सिलाई मशीन पर से नजर उठाई और चिंता से भरी मुस्कान दी। “मोहन, सावित्री की स्कूल की फीस भी बाकी है। मैंने सोचा था कि इस महीने कुछ और सिलाई का काम मिलेगा, पर…” उसकी बात अधूरी रह गई।

अर्जुन स्कूल में होनहार था। उसकी शिक्षिका ने कहा था कि अगर वह परिश्रम करे, तो वह इंजीनियर बन सकता है। अर्जुन की आँखों में यह सपना चमकता था। हर रात, वह अपनी किताबें लेकर घर की एकमात्र बल्ब की रोशनी में पढ़ता। सावित्री, उसकी छोटी बहन, पास बैठकर उसकी किताबों को उत्सुकता से देखती। “भैया, मुझे भी पढ़ना है। मैं भी इंजीनियर बनूँगी,” वह चहककर कहती। अर्जुन हँसता और कहता, “हाँ, सावित्री, तू जरूर बनेगी। बस, पहले स्कूल तो जा।”

लेकिन स्कूल जाना इतना आसान नहीं था। मोहन और राधा की कमाई मुश्किल से घर का खर्च चला पाती थी। सावित्री की स्कूल की फीस कई महीनों से बाकी थी, और स्कूल ने चेतावनी दी थी कि अगर फीस नहीं भरी गई, तो उसका नाम काट दिया जाएगा। मोहन रात को चुपके-चुपके राधा से बात करता, “हम अर्जुन की पढ़ाई पर ध्यान दें, सावित्री तो अभी छोटी है। बाद में देख लेंगे।” राधा का दिल टूटता, पर वह चुप रहती। वह जानती थी कि मोहन की बात में गाँव की पुरानी सोच झलकती थी, लड़कों की पढ़ाई पहले, लड़कियों की बाद में।

एक दिन, मोहन की रिक्शा का पहिया टूट गया। उसे ठीक कराने के लिए उसने अपनी सारी बचत खर्च कर दी। उसी रात, अर्जुन स्कूल से उदास लौटा। “पिताजी, स्कूल में मुझसे फीस माँगी। अगर कल तक नहीं दी, तो मुझे परीक्षा में नहीं बैठने देंगे।” मोहन का चेहरा लटक गया। उसने राधा की ओर देखा, जो सिलाई मशीन पर झुकी हुई थी। राधा ने आँखें पोंछीं और कहा, “मैं कल कुछ और काम ले आऊँगी। तुम चिंता मत करो।”

उसी शाम, मोहन अपने पुराने दोस्त और पड़ोसी, महेश चाचा, से मिलने गया। महेश चाचा भी रिक्शा चालक थे, पर अब उम्र के कारण रिक्शा कम चलाते थे। वह मोहन के लिए एक गुरु की तरह थे। महेश चाचा ने अपनी छोटी-सी चाय की दुकान पर मोहन को बैठाया और कहा, “मोहन, मैंने भी यही जिंदगी जी है। परिश्रम किया, पसीना बहाया, पर अपने बच्चों को पढ़ाने का मौका नहीं छोड़ा। तुम्हारे बच्चे तुम्हारा सूरज हैं। उनके सपनों को मत ढलने दे।”

मोहन ने गहरी साँस ली। “चाचा, मैं चाहता हूँ कि अर्जुन और सावित्री पढ़ें, पर पैसे… और मोहल्ले के शास्त्री जी कहते हैं कि हम जैसे लोग सपने नहीं देखते, बस परिश्रम करते हैं।” महेश चाचा ने मुस्कुराकर कहा, “शास्त्री जी की बातें पुरानी किताबों की तरह हैं। समय बदल रहा है, मोहन। तुम्हें अपने बच्चों के लिए लड़ना होगा।”

मोहन के मन में एक चिंगारी जली। उसने फैसला किया कि वह अपने बच्चों के सपनों को नहीं छोड़ेगा। अगले दिन, वह सुबह जल्दी उठा और शहर के एक स्कूल में गया, जहाँ मुफ्त शिक्षा के लिए कुछ सरकारी योजनाएँ थीं। उसने वहाँ के अधिकारियों से बात की और अर्जुन और सावित्री के लिए छात्रवृत्ति के फॉर्म भरे। लेकिन शास्त्री जी को यह बात नागवार गुजरी। उन्होंने मोहल्ले में मोहन के खिलाफ बातें शुरू कर दीं। “मोहन पागल हो गया है। रिक्शा चालक के बच्चे इंजीनियर बनेंगे? ये सब बेकार के सपने हैं।”

मोहन को इन बातों का दुख हुआ, पर वह रुका नहीं। उसने राधा के साथ मिलकर एक छोटा-सा समूह बनाया, जिसमें मोहल्ले के कुछ और माता-पिता शामिल हुए, जो अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते थे। राधा ने सिलाई का काम बढ़ाया और मोहन ने रात को अतिरिक्त सवारी ढोना शुरू किया। उनका परिश्रम सफल हुआ। अर्जुन और सावित्री को छात्रवृत्ति मिल गई, और सावित्री फिर से स्कूल जाने लगी।

एक दिन, मोहल्ले में एक छोटा-सा समारोह हुआ, जिसमें अर्जुन ने स्कूल की ओर से एक पुरस्कार जीता। सावित्री ने भी अपनी कक्षा में एक कविता पढ़ी, जिसे सुनकर सबकी आँखें नम हो गईं। उसकी कविता थी:

सपनों का सूरज कभी नहीं ढलता,
अगर परिश्रम और हिम्मत साथ चलता।
हमारी राह में काँटे बिछे हों,
पर प्यार और शिक्षा से सब सजे हों।

मोहन और राधा मंच के पास खड़े थे, उनकी आँखों में गर्व के आँसू थे। महेश चाचा ने मोहन के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “देखा, मोहन? तुमने अपने बच्चों के सपनों को उड़ान दी।” शास्त्री जी भी वहाँ थे। उन्होंने चुपचाप सावित्री की कविता सुनी और बाद में मोहन से कहा, “शायद मैं गलत था। तुम्हारे बच्चों ने मुझे सिखाया कि सपने देखने का हक सबको है।”

समय बीता। अर्जुन ने अपनी पढ़ाई पूरी की और एक इंजीनियर बना। सावित्री ने भी स्कूल में अव्वल स्थान प्राप्त किया और डॉक्टर बनने का सपना देखा। मोहन और राधा का छोटा-सा घर अब भी वही था, पर अब वहाँ हँसी और उम्मीद की रोशनी थी। मोहन अब भी रिक्शा चलाता था, पर अब उसकी पीठ सीधी थी, और चेहरे पर एक अलग-सी चमक थी।

नैतिक शिक्षा। यह कहानी हमें सिखाती है कि सपने देखने का हक हर किसी को है, चाहे वह किसी भी परिस्थिति में हो। परिश्रम, हिम्मत, और परिवार का साथ मिलकर असंभव को भी संभव बना सकता है। शिक्षा वह सूरज है, जो हर अंधेरे को दूर कर सकता है, और समाज की पुरानी सोच को बदलने के लिए हमें अपने बच्चों के सपनों को पंख देना होगा।

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