चीता और दो ऊदबिलाव

The Cheetah and the Two Otters

जंगल के बीच एक बड़ी नदी बहती थी। उस नदी के किनारे दो ऊदबिलाव भाई रहते थे – बड़ा भाई सुबुद्ध और छोटा भाई लोभी। दोनों दिनभर मछलियाँ पकड़ते और साथ-साथ खाते, पर लोभी हमेशा अपने भाई से एक मछली ज्यादा लेना चाहता था।

एक दिन दोनों ने मिलकर एक बहुत बड़ी रोहू मछली फँसाई। वह इतनी मोटी-ताजी थी कि दोनों की आँखें चमक उठीं। सुबुद्ध ने कहा, “इसे घर ले चलें, आग जलाकर बाँटकर खाएँगे।” लोभी ने मन ही मन सोचा, “यदि मैंने अभी झगड़ा किया तो आधी ही मिलेगी, पर यदि चाल चली तो पूरी मेरी हो सकती है।”

तभी पास से एक भूखा चीता गुजरा। उसकी नजर मछली पर पड़ी। उसने गरजकर कहा, “यह मछली मेरी है! छोड़ो!” दोनों ऊदबिलाव डर गए, पर सुबुद्ध ने हिम्मत दिखाई और बोला, “महाराज, हमने इसे बड़ी मेहनत से पकड़ा है। आप चाहें तो हम आपको दूसरी मछली लाकर दे दें।” चीता भूख से पागल था। वह बोला, “नहीं! मुझे यही चाहिए, अभी!”

लोभी ने मौका देखा। उसने अपने बड़े भाई की ओर देखकर आँख मारी और चीते से मीठी आवाज में बोला, “महाराज, हम दोनों में इस मछली को लेकर झगड़ा हो रहा है। आप ही न्याय करें। हम इसे आपके सामने रखते हैं – आप फैसला करें कि किसे मिले।” सुबुद्ध समझ गया कि छोटा भाई कुछ गड़बड़ करने वाला है, पर वह चुप रहा।

दोनों ऊदबिलावों ने मछली जमीन पर रख दी और थोड़ा पीछे हट गए। चीता झपटा और मछली को मुँह में दबोचने को हुआ। ठीक उसी पल लोभी ने सुबुद्ध की ओर देखकर चिल्लाया, “देखा! मैंने कहा था न कि तू मुझे धोखा देगा! तूने ही मछली चीते के मुँह में डाल दी!” सुबुद्ध भी चिल्लाया, “झूठ मत बोल! तूने ही मुझे फँसाने के लिए ऐसा किया!”

दोनों ऊदबिलाव एक-दूसरे पर टूट पड़े। बाल खींचने लगे, काटने-खसोटने लगे। चीता पहले तो हैरान हुआ, फिर सोचा, “जब तक ये आपस में लड़ रहे हैं, मैं मछली ले लेता हूँ।” उसने मछली उठाई और आराम से जंगल की ओर चल दिया।

जब ऊदबिलाव थककर रुके तो देखा – न मछली थी, न चीता। केवल जमीन पर मछली की कुछ हड्डियाँ बिखरी थीं। लोभी रोने लगा, “मेरी गलती थी… मैंने लालच में अपना और तेरा दोनों का हिस्सा गँवाया।” सुबुद्ध ने उसका कंधा थपथपाया और बोला, “चल, अब मिलकर दो नई मछलियाँ पकड़ेंगे। पर इस बार बराबर बाँटेंगे।”

दूर पेड़ पर बैठा एक पुराना कछुआ यह सब देख रहा था। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “जब भाई-भाई लड़ते हैं, तीसरा मछली ले जाता है।”

नैतिक शिक्षा: लालच और आपसी झगड़ा दूसरों को फायदा पहुँचाता है। भाईचारा और विश्वास ही सच्ची संपत्ति है।

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