
जंगल के किनारे एक बढ़ई का घर था। वहाँ एक बहुत बड़ा सागौन का लट्ठा पड़ा था जिसमें एक मोटी कील आधी-अधूरी ठुकी हुई थी। लट्ठे में गहरा सूराख था और कील बीच में फँसी थी, जिससे लट्ठा दो हिस्सों में बँटा हुआ-सा लगता था।
एक दिन एक शरारती बंदर, नाम था लट्टू, छत पर से कूदता-उछलता वहाँ पहुँचा। उसने कील को देखा और सोचा, “यह क्या मजे की चीज है! इसे निकालकर खेलूँगा।” उसने पूँछ से लट्ठे को लपेटा, दोनों हाथों से कील पकड़ी और जोर-जोर से खींचने लगा। कील थोड़ी हिली, पर निकली नहीं। लट्टू को और मजा आया। उसने अपना दाहिना पैर लट्ठे के एक हिस्से पर और बायाँ पैर दूसरे हिस्से पर रखा और फिर पूरी ताकत से कील खींची।
अचानक कील निकल गई। जैसे ही कील बाहर निकली, लट्ठे के दोनों हिस्से जोर से आपस में चिपक गए और लट्टू की पूँछ बीच में बुरी तरह फँस गई। लट्टू चीखा, उछला-कूद किया, पर जितना छटपटाता उतना ही ज्यादा दर्द होता। उसकी चीखें सुनकर बढ़ई दौड़ा आया। उसने बंदर को देखा और हँसते हुए बोला, “अरे मूर्ख! जो चीज तुम्हारी नहीं है, उसमें उँगली मत डालो!”
बढ़ई ने बड़ी मुश्किल से लट्ठे को फिर से चीरा लगाकर बंदर को निकाला। लट्टू लंगड़ाता हुआ, पूँछ नीचे करके, दर्द से कराहता जंगल की ओर भागा। पीछे से बढ़ई चिल्लाया, “याद रखना, दूसरों के काम में दखल देने का यही अंजाम होता है!”
उस दिन के बाद लट्टू ने कभी किसी के काम में नाक नहीं डाली। जब भी कोई छोटा बंदर शरारत करने जाता, बड़े बंदर उसे डाँटते, “देख लट्टू का अंजाम! लकड़बग्घा मत निकालना!”
नैतिक शिक्षा: जो चीज तुम्हारी नहीं और जिसमें तुम्हें समझ नहीं, उसमें हाथ डालने से भारी नुकसान होता है। दूसरों के काम में बिना सोचे-समझे दखल न दें।
