
जंगल में गरजनार नाम का एक बहुत बड़ा शेर राजा था। उसकी पत्नी का नाम था रानी रौनक। एक दिन गरजनार ने एक बड़ा हिरण शिकार किया और उसे अपनी गुफा में ले आया। उसने रानी रौनक से कहा, “मैं थोड़ा सोने जा रहा हूँ। जब बच्चे आएँ तो सबको बराबर बाँट देना।”
पास ही एक चालाक सियार रहता था, नाम था चालबाज। वह गुफा के बाहर झाड़ियों में छिपा सब देख रहा था। उसने सोचा, “इतना सारा मांस! अगर मैं कोई तरकीब करूँ तो पूरा मांस मेरे पास आ सकता है।”
जब शेर सो गया, चालबाज धीरे-धीरे गुफा में घुसा। उसने रानी रौनक से बहुत मीठी आवाज में कहा, “रानी माँ, बाहर बहुत सारे शेर आ रहे हैं। वे कह रहे हैं कि गरजनार ने उनका शिकार छीना है और अब वे हमला करने वाले हैं। मैंने सोचा आपको बता दूँ।”
रानी रौनक घबरा गई। उसने कहा, “फिर क्या करें? हमारे छोटे-छोटे बच्चे हैं।” चालबाज बोला, “आप मांस को छिपा दीजिए और बच्चों को लेकर पीछे के रास्ते से भाग जाइए। मैं राजा को जगाकर बाहर ले जाऊँगा।”
रानी रौनक ने जल्दी-जल्दी सारा मांस एक बड़े पत्ते में लपेटा और गुफा के पीछे एक गड्ढे में छिपा दिया। फिर बच्चों को लेकर भागने लगी। चालबाज ने शेर को जगाया और चिल्लाया, “महाराज! दुश्मन आ गए! रानी और बच्चे भाग गए हैं!”
शेर गुस्से में गरजा और बाहर की ओर दौड़ा। उधर चालबाज हँसते हुए गड्ढे में गया और सारा मांस अकेले खाने लगा।
जब शेर बाहर निकला तो वहाँ कोई नहीं था। उसे कुछ गड़बड़ लगा। वह वापस लौटा तो देखा, गुफा खाली, मांस गायब और चालबाज मुँह में मांस का टुकड़ा दबाए भाग रहा था।
शेर ने एक झपट्टे में चालबाज को पकड़ लिया। सियार डर के मारे काँपने लगा। शेर ने पूछा, “यह सब तूने किया?” चालबाज ने रोते हुए कहा, “मैं तो आपकी मदद कर रहा था महाराज… बस थोड़ा-सा मांस मुँह में चला गया।”
रानी रौनक भी बच्चों के साथ वापस आ गई। उसने सारी बात समझी और शेर से बोली, “इसे छोड़ दो। यह हमेशा के लिए सबक सीख गया।” शेर ने सियार को एक हल्का-सा थप्पड़ मारा और कहा, “अब कभी झूठ बोलकर किसी का हक मत छीनना!”
चालबाज पूँछ दबाकर भाग गया और उस दिन के बाद उसने कभी किसी के हिस्से पर नजर नहीं डाली।
नैतिक शिक्षा: झूठ बोलकर या चालाकी से दूसरों का हक छीनने की कोशिश कभी कामयाब नहीं होती। ईमानदारी ही सबसे बड़ा धन है।
