
जंगल में एक बहुत बड़ा हाथी रहता था, नाम था गजराज। वह बहुत ताकतवर था, पर दिल का बहुत अच्छा था। वह रोज सुबह नदी में नहाने जाता और रास्ते में छोटे जानवरों को पानी पिलाता, पेड़ों को हिला-हिलाकर फल गिराता ताकि सबको खाना मिले। सब उसे प्यार करते थे।
पास ही एक छोटा-सा सियार रहता था, नाम था धूर्तू। धूर्तू बहुत चालाक था, पर उसे मेहनत बिल्कुल पसंद नहीं थी। वह हमेशा सोचता, “कैसे बिना कुछ किए गजराज की तरह बड़ा और सम्मानित बनूँ?”
एक दिन धूर्तू ने गजराज को देखा जो एक ऊँचे पेड़ को अपनी सूंड से हिला रहा था। आम के आम गिर रहे थे और सारे जानवर खुशी-खुशी खा रहे थे। धूर्तू को जलन हुई। उसने सोचा, “मुझे भी ऐसा करना चाहिए, सब मुझे राजा मानेंगे!”
अगले दिन धूर्तू एक छोटे से पेड़ के पास गया। उसने पूरी ताकत से पेड़ को धक्का दिया। पेड़ हिला नहीं, उल्टा धूर्तू खुद पीछे गिर पड़ा। उसका मुँह जमीन से टकराया और दो दाँत टूट गए। दर्द से वह चिल्लाने लगा।
गजराज दूर से सब देख रहा था। वह धीरे-धीरे आया और अपनी सूंड से धूर्तू को उठाया। उसने पूछा, “क्या हुआ छोटे भाई?” धूर्तू रोते हुए बोला, “मैं भी आपके जैसा बनना चाहता था… सबको फल बाँटना चाहता था… पर मैं तो कुछ भी नहीं कर पाया।”
गजराज ने मुस्कुराकर कहा, “धूर्तू, मैं बड़ा इसलिए नहीं हूँ कि मैं हाथी हूँ। मैं बड़ा इसलिए हूँ क्योंकि मैं दूसरों की मदद करता हूँ। तुम छोटे हो, पर तुम्हारे पास तेज दिमाग है। तुम अपनी चालाकी से सबकी मदद कर सकते हो।”
धूर्तू ने सिर झुकाया। उसने कहा, “मैं अब जलन नहीं करूँगा। मैं अपनी ताकत से सबकी मदद करूँगा।”
अगले दिन से धूर्तू ने अपनी चालाकी का अच्छा इस्तेमाल करना शुरू किया। वह जंगल में खोए हुए बच्चों को रास्ता बताता, खतरे की सूचना पहले पहुँचाता, और जब कोई फल ऊँचे पेड़ पर फँस जाता तो गजराज को बुलाकर गिरवाता। सब उसे “छोटा हीरो” कहने लगे।
गजराज और धूर्तू अब सबसे अच्छे दोस्त बन गए। एक दिन गजराज ने कहा, “देखा, अपनी-अपनी जगह हर कोई बड़ा हो सकता है।”
नैतिक शिक्षा: दूसरे की ताकत की जलन करने से कुछ नहीं मिलता। अपनी खासियत को पहचानो और उससे दूसरों की मदद करो, यही सच्ची बड़ाई है।
