
एक बार बादशाह अकबर को दूर के एक राज्य से एक अनमोल तोहफ़ा मिला। वह था एक सुन्दर, चमकता हुआ फलों का टोकरा। टोकरे में बड़े-बड़े, लाल-लाल अनार, मीठे अंगूर और रसीले आम भरे थे। साथ में एक चिट्ठी थी जिसमें लिखा था: “जहाँपनाह, यह फल आपके लिए विशेष रूप से चुने गए हैं। इन्हें खाकर आपको हमेशा स्वास्थ्य और खुशी मिलेगी।”
अकबर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने टोकरे को दरबार में मंगवाया और सबके सामने उसकी तारीफ़ की। फिर बोले, “आज हम खुद इन फलों का स्वाद चखेंगे।”
बीरबल उस दिन दरबार में मौजूद थे। जब उन्होंने टोकरा देखा तो उनकी भौंहें एक पल के लिए सिकुड़ीं। वे चुपचाप पास आए और फलों को ध्यान से देखने लगे। अचानक उन्होंने बादशाह का हाथ पकड़ लिया और धीरे से कहा, “हुजूर, माफ़ कीजिए, लेकिन ये फल अभी न खाइए। मुझे इन पर ज़रा शक है।”
दरबार में सन्नाटा छा गया। अकबर ने हैरानी से पूछा, “शक? ये तो हमारे मित्र राज्य का तोहफ़ा है, बीरबल!”
बीरबल ने शांत स्वर में कहा, “जहाँपनाह, मैं एक छोटा-सा परीक्षण करना चाहता हूँ। अगर आप इजाज़त दें तो।”
अकबर ने सहमति दी। बीरबल ने तुरंत अपने पास खड़े एक छोटे बंदर को बुलाया जो दरबार में अक्सर घूमा करता था। उन्होंने एक अनार उस बंदर को दिया। बंदर ने बड़े चाव से अनार खाया। कुछ ही पल बाद वह ज़मीन पर लोटने लगा, उसका मुँह से झाग निकलने लगा और थोड़ी देर में वह मर गया।
दरबार में हड़कंप मच गया। सभी दरबारी पीछे हट गए। अकबर का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। बीरबल ने शीश झुकाकर कहा, “हुजूर, ये फल ज़हर में डुबोकर भेजे गए थे। अगर आप इन्हें खा लेते तो आज हम आपको खो देते।”
अकबर ने गहरी साँस ली और पूछा, “पर बीरबल, तुम्हें पहले ही कैसे पता चल गया?”
बीरबल ने मुस्कुराते हुए बताया, “हुजूर, तीन बातें मुझे खटकीं। पहला: इतने मौसम के बाहर ये सारे फल एक साथ कैसे मिल सकते हैं? दूसरा: टोकरे के अंदर की लकड़ी पर हल्की-हल्की सफ़ेद परत थी, जो ज़हर की गंध दे रही थी। तीसरा: चिट्ठी में लिखा था ‘हमेशा स्वास्थ्य और खुशी’, पर जिस राज्य से ये आया है, वहाँ अभी युद्ध की तैयारी चल रही है। दुश्मन खुशी की बात नहीं लिखता।”
अकबर ने बीरबल को गले लगाया और सारे दरबार के सामने कहा, “बीरबल, तुमने आज हमारी जान बचाई। तुम्हारी सतर्कता और बुद्धि के सामने सारा वैभव फीका है।”
उस दिन से अकबर ने नियम बनाया कि कोई भी बाहर का खाना-पीना पहले जाँचा जाएगा। और बीरबल को “रक्षक-ए-जहाँपनाह” की उपाधि दी गई।
नैतिक शिक्षा: छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देना और सतर्क रहना कई बार सबसे बड़ी जान भी बचा लेता है।
