पक्षी और बंदर

The Birds and the Monkeys

एक बहुत ऊँचे पीपल के पेड़ पर सैकड़ों छोटे-छोटे पक्षी अपने घोंसले बनाकर रहते थे। ठंड का मौसम था, पर दिन में धूप अच्छी लगती थी। सब पक्षी मिल-जुल कर गाते, खेलते और एक-दूसरे के घोंसलों की देखभाल करते थे।

पास ही एक झुंड बंदर रहता था। उनका सरदार था उछलू – बहुत शरारती और बातूनी। बंदरों को ठंड बिल्कुल पसंद नहीं थी। एक दिन तेज बारिश हुई और हवा इतनी ठंडी हो गई कि सारे बंदर काँपने लगे। उछलू ने देखा कि पक्षियों के घोंसले सूखे और गर्म हैं। उसने सोचा, “चलो, इनसे घोंसले ले लेते हैं!”

उछलू अपने सारे बंदरों को लेकर पेड़ पर चढ़ गया और जोर-जोर से चिल्लाने लगा, “ये घोंसले अब हमारे हैं! सब बाहर निकलो!” पक्षी डर गए। छोटे-छोटे बच्चे रोने लगे। पर एक बूढ़ा गौरैया, जिसका नाम था बुद्धि चाची, आगे आई और बोली, “बंदर भाई, घोंसले हमने अपनी मेहनत से बनाए हैं। तुम इतने बड़े-बड़े हो, तुम्हें तो खुद के लिए मजबूत घर बना लेना चाहिए।”

उछलू हँसा और बोला, “मुझे मेहनत करना नहीं आता! जो चाहिए, ले लूँगा!” फिर उसने एक घोंसला उखाड़ दिया और उसमें बैठ गया। बाकी बंदर भी घोंसले तोड़ने लगे।

बुद्धि चाची ने सब पक्षियों को इशारा किया। सारे पक्षी चुपके से उड़कर दूर चले गए और एक बहुत बड़ा सूखा पेड़ ढूँढ लाए। उस पेड़ में ढेर सारी सूखी पत्तियाँ और घास जमा थी। पक्षियों ने मिलकर उनमें आग लगा दी। दूर से धुआँ और लपटें उठने लगीं।

तब बुद्धि चाची जोर से चिल्लाई, “आग! आग लग गई! पूरा जंगल जल रहा है!” बंदर डर गए। उछलू चिल्लाया, “भागो! भागो!” सारे बंदर घोंसले छोड़कर इधर-उधर भागने लगे। कुछ पूँछ में आग लगने के डर से पानी में कूद गए।

जब बंदर भाग गए, पक्षी हँसते-हँसते वापस आए और अपने घोंसले ठीक किए। बुद्धि चाची ने सबको गले लगाया और बोली, “देखा, बुद्धि से बड़ी कोई ताकत नहीं।”

उछलू बहुत दूर भाग गया था। ठंड से फिर काँपते हुए उसने अपने दोस्तों से कहा, “अब से हम खुद मेहनत करके अपना घर बनाएँगे। दूसरों का सामान छीनना अच्छा नहीं।”

उस दिन के बाद बंदरों ने पत्तों-टहनियों से अपना मजबूत आशियाना बनाया और पक्षियों से दोस्ती कर ली। दोनों मिल-जुल कर रहने लगे।

नैतिक शिक्षा: दूसरों की मेहनत का सामान छीनने की बजाय खुद मेहनत करो। बुद्धि और एकता से हर मुश्किल हल हो जाती है।

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