
जंगल में एक बहुत प्यारी हिरणी रहती थी, नाम था चंचला। उसकी आँखें चमकदार थीं और वह बहुत तेज दौड़ती थी। उसके साथ उसका छोटा-सा बच्चा चीकू हमेशा रहता था। दोनों माँ-बेटे घास के मैदान में खेलते और फूलों की खुशबू लेते थे।
पास ही एक चालाक सियार रहता था, नाम था भुलावू। भुलावू को चंचला की तेज रफ्तार से बहुत जलन होती थी। वह सोचता था, “मैं कितना भी दौड़ूँ, यह हिरणी मुझसे आगे निकल जाती है। इसे हराना है!”
एक दिन भुलावू ने एक चाल सोची। उसने जंगल में एक गड्ढा खोदा और उस पर सूखी घास-पत्तियाँ डाल दीं। फिर वह चंचला के पास गया और बहुत प्यार से बोला, “चंचला बहन, चलो आज दौड़ की होड़ करते हैं! जो जीतेगा वह जंगल का सबसे तेज कहलाएगा।”
चंचला को खेल अच्छा लगा। उसने कहा, “ठीक है! पर मेरा बच्चा चीकू भी साथ चलेगा।” भुलावू ने मुस्कुराते हुए कहा, “बिल्कुल!”
दौड़ शुरू हुई। चंचला और चीकू तेजी से आगे निकल गए। भुलावू जान-बूझकर पीछे रह गया ताकि वे गड्ढे की ओर जाएँ। अचानक चीकू काें घास पर पैर रखा और वह गड्ढे में गिर पड़ा। चंचला ने पीछे मुड़कर देखा तो उसका दिल बैठ गया। वह चीकू को बचाने रुक गई।
भुलावू हँसते हुए दौड़ा आया और चिल्लाया, “मैं जीत गया! मैं सबसे तेज हूँ!” पर चंचला ने उसे एक प्यारी-सी मुस्कान दी और कहा, “भुलावू भाई, तुमने दौड़ नहीं जीती, तुमने दोस्ती हार गए। मेरे लिए मेरा बच्चा सबसे कीमती है। तेज दौड़ने से ज्यादा जरूरी है प्यार और मदद करना।”
भुलावू को अपनी गलती समझ आई। वह शर्म से सिर झुकाकर गड्ढे में गया और चीकू को अपनी पीठ पर बैठाकर बाहर निकाला। चीकू ने उसे गले लगाया। भुलावू की आँखों में आँसू आ गए। उसने कहा, “मैं बहुत बेवकूफ था। आज से मैं तुम्हारा सच्चा दोस्त हूँ।”
उस दिन के बाद भुलावू, चंचला और चीकू तीनों सबसे अच्छे दोस्त बन गए। भुलावू अब किसी से जलन नहीं करता था, बल्कि जब कोई मुसीबत में फँसता तो सबसे पहले मदद के लिए दौड़ता था।
नैतिक शिक्षा: जीतने से ज्यादा जरूरी है अपनों का साथ निभाना और सच्ची दोस्ती करना। जलन छोड़ो, प्यार बाँटो।
