एक नन्हा दीप

बिहार के मधुपुर गाँव में, जहाँ खेतों की हरियाली और नदियों की लहरें प्रकृति का संगीत रचती थीं, एक छोटा-सा संसार बसा था। गाँव के बीच में एक पुराना बरगद का पेड़ था, जिसके नीचे बच्चे खेलते और बुजुर्ग कहानियाँ सुनाते। सूरज ढलने पर, जब आसमान में तारे टिमटिमाने लगते, गाँव की गलियों में मिट्टी के दीयों की रोशनी फैलती थी। यहीं, इस गाँव में, रहता था अनघ, एक 15 वर्षीय किशोर, जिसके दिल में अपने गाँव को रोशन करने का सपना था, जैसे एक नन्हा दीप अंधेरे को चुनौती देता है।

अनघ का घर गाँव के किनारे था, मिट्टी और खपड़ैल से बना एक छोटा-सा मकान, जिसके आँगन में एक तुलसी का पौधा था। उसके पिता की मृत्यु छह साल पहले एक दुर्घटना में हो गई थी, और तब से उसकी माँ, सारिका, दूसरों के घरों में बर्तन धोकर और खेतों में काम करके परिवार को पाल रही थी। अनघ स्कूल में होनहार था। वह सपना देखता था कि एक दिन वह वैज्ञानिक बनेगा और गाँव में बिजली की रोशनी लाएगा, क्योंकि मधुपुर में रात को केवल दीयों और लालटेनों की रोशनी थी।

हर शाम, अनघ अपने छोटे भाई, रामू, के साथ बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ता। रामू, जो स्कूल नहीं जा पाता था, अपने भाई की किताबों को उत्सुकता से देखता। “भैया, ये ‘विज्ञान’ क्या होता है? क्या इससे हम सितारों को छू सकते हैं?” रामू ने एक दिन पूछा, अपनी उंगलियों से किताब के पन्नों को सहलाते हुए। अनघ ने मुस्कुराकर कहा, “हाँ, रामू। विज्ञान हमें सितारों तक ले जा सकता है, लेकिन पहले हमें कठिन परिश्रम करना होगा।”

गाँव के स्कूल में अनघ की मुलाकात ममता से हुई थी, जो उसकी सहपाठी थी। ममता भी पढ़ाई में तेज थी, लेकिन उसका परिवार, जो निचली जाति से था, उसकी पढ़ाई के खिलाफ था। ममता के पिता मानते थे कि लड़कियों को घर का काम सीखना चाहिए, न कि किताबें पढ़ना। अनघ और ममता अक्सर स्कूल के बाद एक साथ पढ़ते और अपने सपनों की बातें करते। “अनघ, मैं डॉक्टर बनना चाहती हूँ,” ममता ने एक दिन कहा। “लेकिन मेरे पिताजी कहते हैं कि मेरी शादी जल्दी कर देंगे।” अनघ ने उसका हौसला बढ़ाया, “ममता, हार मत मानना। हम दोनों मिलकर अपने सपनों को सच करेंगे।”

लेकिन गाँव के ठाकुर साहब को अनघ और ममता जैसे बच्चों के सपने पसंद नहीं थे। ठाकुर साहब, जो गाँव के सबसे बड़े जमींदार थे, मानते थे कि निचली जाति के लोग केवल मजदूरी के लिए हैं। एक दिन, जब अनघ ने गाँव में बिजली लाने के लिए एक छोटा-सा मॉडल बनाया और स्कूल में प्रदर्शित किया, ठाकुर साहब ने गुरुजी से नाराज़गी जताई। “रमेश मिश्रा, तुम इन बच्चों को बेकार के सपने दिखा रहे हो। अनघ जैसे लोग खेतों में काम करें, यही उनकी जगह है,” उन्होंने कहा।

गुरुजी ने शांत स्वर में जवाब दिया, “ठाकुर साहब, शिक्षा हर बच्चे का हक है। अनघ और ममता जैसे बच्चे हमारे गाँव का भविष्य हैं।” लेकिन ठाकुर साहब ने उनकी बात अनसुनी कर दी। उस रात, जब अनघ घर लौटा, सारिका ने चिंतित स्वर में कहा, “बेटा, ठाकुर साहब नाराज़ हैं। वे कह रहे थे कि तेरा पढ़ना-लिखना गाँव की व्यवस्था को बिगाड़ेगा। अब तू पढ़ाई छोड़ दे और खेतों में काम शुरू कर।”

अनघ का दिल टूट गया। उसने माँ का हाथ पकड़ा और कहा, “माँ, अगर मैं पढ़ाई छोड़ दूँगा, तो रामू और ममता जैसे बच्चों का क्या होगा? मैं गाँव के लिए कुछ करना चाहता हूँ।” सारिका की आँखें नम हो गईं। वह अपने बेटे की हिम्मत से प्रभावित थी, लेकिन गाँव के दबाव से डरती थी।

अगले दिन, अनघ ने गुरुजी से अपनी परेशानी साझा की। गुरुजी ने उसका कंधा थपथपाया और कहा, “अनघ, सपने आसान नहीं होते, लेकिन वे सच हो सकते हैं। तुम्हें गाँव वालों को दिखाना होगा कि तुम्हारे सपने उनके लिए भी फायदेमंद हैं।” गुरुजी की बातों ने अनघ को नई प्रेरणा दी। उसने फैसला किया कि वह गाँव में एक विज्ञान प्रदर्शनी आयोजित करेगा, जिसमें वह और ममता अपने बनाए मॉडल दिखाएँगे। वह चाहता था कि गाँव वाले देखें कि शिक्षा और विज्ञान गाँव को बदल सकते हैं।

प्रदर्शनी की तैयारियाँ शुरू हुईं। अनघ और ममता ने दिन-रात परिश्रम किया। अनघ ने एक छोटा-सा सौर ऊर्जा मॉडल बनाया, जो सूरज की रोशनी से बिजली पैदा करता था। ममता ने एक साधारण पानी शुद्धिकरण मॉडल बनाया। रामू ने भी अपने भाई की मदद की, पुराने डिब्बों और तारों को इकट्ठा करके। सारिका ने अपनी छोटी-सी बचत से कुछ सामान खरीदा। लेकिन ठाकुर साहब को यह सब पसंद नहीं आया। उन्होंने पंचायत में कहा, “ये अनघ और ममता गाँव के बच्चों को भटका रहे हैं। इस प्रदर्शनी को रोकना होगा।”

गुरुजी ने पंचायत में अनघ का पक्ष लिया। “ठाकुर साहब, इन बच्चों को एक मौका दीजिए। अगर वे गलत हैं, तो हम सब देख लेंगे।” कुछ लोग गुरुजी के समर्थन में आए, लेकिन ठाकुर साहब चुप रहे। अनघ ने अपनी माँ से कहा, “माँ, मुझे विश्वास है कि हम गाँव वालों को समझा लेंगे। बस, तुम मेरे साथ रहो।”

प्रदर्शनी का दिन आ गया। बरगद के पेड़ के नीचे एक साधारण मंच सजाया गया। गाँव के लोग उत्सुकता और संदेह के साथ जमा हुए। अनघ ने अपने सौर ऊर्जा मॉडल को दिखाया और समझाया कि कैसे यह गाँव में रात को रोशनी ला सकता है। ममता ने अपने पानी शुद्धिकरण मॉडल के बारे में बताया, जो गाँव के बीमारियों से बचाव में मदद कर सकता था। रामू ने बच्चों को छोटे-छोटे प्रयोग दिखाए।

जब अनघ ने अपने मॉडल से एक बल्ब जलाया, तो गाँव वालों की आँखें चमक उठीं। एक बुजुर्ग ने कहा, “अनघ, तुमने तो कमाल कर दिया!” ममता की प्रस्तुति ने भी सबको प्रभावित किया। सारिका की आँखों में गर्व के आँसू थे। ठाकुर साहब चुपचाप सब देख रहे थे। प्रदर्शनी के अंत में, अनघ ने कहा, “हमारे सपने गाँव के लिए हैं। अगर हम पढ़ेंगे और परिश्रम करेंगे, तो मधुपुर को कोई नहीं रोक सकता।”

प्रदर्शनी के बाद, गाँव में बदलाव की हवा चली। ठाकुर साहब ने अनघ और ममता की तारीफ की और कहा, “मैंने तुम्हें गलत समझा। तुम जैसे बच्चे हमारे गाँव का भविष्य हैं।” गाँव वालों ने मिलकर अनघ और ममता की पढ़ाई के लिए चंदा इकट्ठा किया। रामू भी स्कूल जाने लगा। गुरुजी की मदद से गाँव में एक छोटा-सा विज्ञान केंद्र शुरू हुआ, जहाँ बच्चे प्रयोग सीखने लगे।

समय बीता। अनघ ने अपनी पढ़ाई पूरी की और एक वैज्ञानिक बना। उसने मधुपुर में सौर ऊर्जा से बिजली लाने में मदद की। ममता डॉक्टर बनी और गाँव में एक छोटा-सा क्लिनिक खोला। सारिका का छोटा-सा मकान अब भी वही था, लेकिन अब वहाँ दीयों के साथ-साथ बिजली की रोशनी थी। अनघ जानता था कि उसका नन्हा दीप अब पूरे गाँव को रोशन कर रहा था।

नैतिक शिक्षा। यह कहानी हमें सिखाती है कि सपने, चाहे कितने भी छोटे हों, परिश्रम और हिम्मत से सच हो सकते हैं। शिक्षा और विज्ञान समाज की रूढ़ियों को तोड़कर हर किसी को समान अवसर दे सकते हैं। एक नन्हा दीप भी अंधेरे को चुनौती दे सकता है, बशर्ते उसे जलने का मौका मिले।

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