एक नई शुरुआत

गंगा के किनारे बसा एक छोटा-सा गाँव था, काशीपुर। यह गाँव अपनी शांत वादियों और आपसी भाईचारे के लिए जाना जाता था। गाँव के बीचों-बीच एक पुराना बरगद का पेड़ था, जिसके नीचे बच्चे खेलते, बुजुर्ग बातें करते, और कभी-कभी गाँव की पंचायत भी बैठती थी। इसी गाँव में रहती थी सरिता, एक ऐसी महिला जिसकी कहानी गाँव के हर कोने में गूंजती थी।

सरिता की उम्र चालीस के आसपास थी। उसका चेहरा सादगी का प्रतीक था, लेकिन उसकी आँखों में एक गहरी उदासी छिपी थी। बचपन में ही उसने अपने माता-पिता को खो दिया था। उसकी शादी एक साधारण किसान, रमेश, से हुई थी, जो मेहनती और ईमानदार था। लेकिन भाग्य ने सरिता के साथ फिर से क्रूर मजाक किया। कुछ साल पहले एक बाढ़ में रमेश की जान चली गई, और सरिता अपने दो बच्चों, सात साल की काव्या और बारह साल के अर्जुन, के साथ अकेली रह गई।

गाँव में सरिता की स्थिति दयनीय थी। रमेश के जाने के बाद खेतों की देखभाल करना मुश्किल हो गया था। गाँव के कुछ लोग मदद करते, लेकिन वह मदद हमेशा पर्याप्त नहीं थी। सरिता ने हिम्मत नहीं हारी। उसने दिन-रात मेहनत की—खेतों में काम किया, दूसरों के घरों में बर्तन साफ किए, और कभी-कभी मिट्टी के बर्तन बनाकर बेचे। लेकिन उसकी मेहनत के बावजूद, बच्चों को अच्छी शिक्षा और पौष्टिक भोजन देना एक चुनौती था। काव्या को पढ़ने का शौक था, और अर्जुन सपने देखता था कि वह एक दिन डॉक्टर बनेगा। लेकिन स्कूल की फीस और किताबों का खर्च सरिता के लिए बोझ बनता जा रहा था।

एक दिन, गाँव में एक नई शिक्षिका आईं—सुहासिनी मैडम। वह शहर से थीं और गाँव के स्कूल में बच्चों को पढ़ाने आई थीं। सुहासिनी ने देखा कि काव्या और अर्जुन बहुत होशियार थे, लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति के कारण वे स्कूल छोड़ने की कगार पर थे। सुहासिनी ने सरिता से मुलाकात की और उनकी कहानी सुनी। सरिता की मेहनत और बच्चों के प्रति उसका समर्पण देखकर सुहासिनी का दिल पिघल गया।

सुहासिनी ने गाँव में एक छोटी-सी पहल शुरू की। उन्होंने गाँव की महिलाओं को एकत्र किया और एक स्वयं-सहायता समूह बनाया। इस समूह में महिलाएँ अपने हुनर को एक साथ लाकर छोटे-छोटे व्यवसाय शुरू करने की योजना बनाती थीं। सरिता को इस समूह में शामिल होने का न्योता मिला। पहले तो सरिता हिचकिचाई। उसे डर था कि वह इस नई जिम्मेदारी को निभा नहीं पाएगी। लेकिन सुहासिनी ने उसका हौसला बढ़ाया। “सरिता दी, तुम्हारे अंदर बहुत ताकत है। बस उसे बाहर लाने की जरूरत है,” सुहासिनी ने कहा।

समूह में सरिता ने अपने मिट्टी के बर्तन बनाने के हुनर को और निखारा। सुहासिनी ने शहर के कुछ दुकानदारों से संपर्क किया, और जल्द ही सरिता के बनाए बर्तनों की माँग बढ़ने लगी। गाँव की दूसरी महिलाएँ भी अपने-अपने हुनर लेकर सामने आईं—कोई मसाले पीसती, कोई साड़ियाँ सिलती, तो कोई हस्तशिल्प बनाती। धीरे-धीरे समूह की कमाई बढ़ने लगी, और सरिता को अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए पर्याप्त पैसे मिलने लगे।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। सरिता ने सिर्फ़ अपनी जिंदगी नहीं बदली, बल्कि वह गाँव की दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणा बन गई। उसने दूसरों को सिखाया कि मेहनत और एकजुटता से हर मुश्किल को पार किया जा सकता है। गाँव का बरगद का पेड़ अब न सिर्फ़ छाँव देता था, बल्कि वहाँ महिलाएँ अपने सपनों को साकार करने की योजनाएँ बनाती थीं।

काव्या और अर्जुन की पढ़ाई फिर से शुरू हुई। अर्जुन ने स्कूल की एक प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और पहला पुरस्कार जीता। उस दिन सरिता की आँखों में आँसुओं के साथ-साथ गर्व भी था। उसने महसूस किया कि उसकी मेहनत और सुहासिनी जैसे लोगों का साथ उसे एक नई शुरुआत दे गया।

नैतिक शिक्षा। यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन में कितनी भी मुश्किलें क्यों न आएँ, हिम्मत और समुदाय का साथ हमें नई राह दिखा सकता है। अपने हुनर को पहचानना और दूसरों की मदद करना न सिर्फ़ हमारी जिंदगी को बेहतर बनाता है, बल्कि समाज को भी मजबूत करता है।

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