शाम ढल रही थी। बस स्टॉप पर अकेली खड़ी रही मीना। बगल में, ताजगी से भरा एक युवक, राहुल, गुनगुनाते हुए बस का इंतज़ार कर रहा था। अचानक मीना की किताबों का थैला फट गया, कागज़ इधर-उधर बिखर गए। शर्मिंदा मीना उन्हें समेटने लगी। राहुल हंसते हुए आगे बढ़ा, “कोई बात नहीं, मिलकर जुटाते हैं।”
थोड़ी देर में, हँसी-मज़ाक करते हुए वे सब कागज़ समेट चुके थे। मीना, राहुल की मदद से आभारी थी। बस आ गई। उतने में, राहुल को याद आया, उसकी बस तो दूसरी दिशा में जाती है। फिर भी, उसने मीना को बस में चढ़ाया और मुस्कुराते हुए कहा, “अच्छी किताबें थीं, क्या पढ़ रही हो?” मीना ने मुस्कुराकर बताया।
दोनों की रास्ते अलग थे, पर कुछ देर की मदद और बातचीत ने उनके दिनों को खुशन कर दिया।
नैतिक शिक्षा। छोटी-छोटी मदद और दयालुता ज़िंदगी को आसान और खूबसूरत बना सकती है। रास्ते भले ही अलग हों, पर अच्छे कर्मों का असर लंबे समय तक रहता है।
