हरियाणा के एक छोटे से कस्बे, रेवाड़ी, में बसी थी राधा। राधा की उम्र करीब पचास साल थी, और वह अपने मोहल्ले में “राधा दी” के नाम से मशहूर थी। उसका छोटा-सा घर हमेशा बच्चों की हँसी और पड़ोसियों की बातों से गूंजता रहता था। राधा एक विधवा थी, जिसने अपने पति को दस साल पहले एक सड़क दुर्घटना में खो दिया था। उसका इकलौता बेटा, विशाल, अब शहर में नौकरी करता था और अपनी माँ को हर महीने कुछ पैसे भेजता था। लेकिन राधा की असली ताकत थी उसका दिल, जो हर किसी के लिए खुला रहता था।
राधा का मोहल्ला विविधता से भरा था। यहाँ हिंदू, मुस्लिम, और सिख परिवार एक साथ रहते थे, और राधा हर किसी की मदद के लिए हमेशा तैयार रहती थी। वह सुबह जल्दी उठकर अपने छोटे से आँगन में तुलसी की पूजा करती, फिर पड़ोस के बच्चों को पढ़ाने के लिए अपने घर के बरामदे में बैठ जाती। राधा ने स्कूल में ज्यादा पढ़ाई नहीं की थी, लेकिन उसे कहानियाँ सुनाने और बच्चों को नैतिकता की सीख देने का हुनर था। बच्चे उसकी कहानियों में खो जाते, और उनके माता-पिता राधा की सादगी और समझदारी की तारीफ करते नहीं थकते।
लेकिन राधा का जीवन इतना आसान नहीं था। मोहल्ले में एक नया परिवार आया था, रहमान का परिवार। रहमान एक रिक्शा चालक था, और उसकी पत्नी, फातिमा, घरों में काम करके परिवार का खर्च चलाती थी। उनके तीन बच्चे थे, जिनमें से सबसे बड़ा, नौ साल का आसिफ, स्कूल नहीं जाता था। आसिफ दिनभर सड़कों पर कबाड़ बीनता और अपने छोटे भाई-बहनों के लिए कुछ कमाने की कोशिश करता। राधा ने जब यह देखा, तो उसका दिल पसीज गया। उसने सोचा कि अगर आसिफ को सही दिशा मिले, तो वह अपनी जिंदगी को बेहतर बना सकता है।
राधा ने रहमान और फातिमा से बात की। पहले तो वे हिचकिचाए। रहमान ने कहा, “राधा दी, हमारी हालत ऐसी नहीं कि आसिफ को स्कूल भेज सकें। उसकी कमाई से ही घर का खर्च चलता है।” राधा ने हार नहीं मानी। उसने मोहल्ले के कुछ और लोगों को इकट्ठा किया और एक छोटी-सी योजना बनाई। राधा ने अपने घर में बच्चों के लिए मुफ्त पढ़ाई शुरू की, जहाँ वह आसिफ और उसके भाई-बहनों को बुनियादी पढ़ाई-लिखाई सिखाने लगी। उसने अपने बेटे विशाल से बात की, और विशाल ने अपने दोस्तों से चंदा इकट्ठा करके आसिफ के लिए स्कूल की किताबें और यूनिफॉर्म का इंतजाम किया।
शुरुआत में आसिफ को पढ़ाई में मन नहीं लगता था। वह शरमाता और अक्सर भागने की कोशिश करता। लेकिन राधा की धैर्य और प्यार भरी कहानियों ने धीरे-धीरे उसका दिल जीत लिया। राधा उसे भगवान कृष्ण और सुदामा की दोस्ती की कहानी सुनाती, और कहती, “आसिफ, मेहनत और अच्छे दोस्त जिंदगी को बदल सकते हैं।” धीरे-धीरे आसिफ ने पढ़ना-लिखना शुरू किया। उसकी आँखों में अब एक नया सपना चमकने लगा—वह अपने परिवार को गरीबी से निकालना चाहता था।
मोहल्ले में कुछ लोग राधा की इस पहल से खुश नहीं थे। कुछ ने कहा कि वह “बाहरी” लोगों की मदद करके समय बर्बाद कर रही है। राधा ने इन बातों को नजरअंदाज किया और अपने काम में लगी रही। उसका मानना था कि इंसानियत का कोई धर्म या जाति नहीं होती। धीरे-धीरे उसकी मेहनत रंग लाई। आसिफ ने स्कूल में दाखिला लिया और अपनी कक्षा में अव्वल आने लगा। फातिमा ने भी राधा की प्रेरणा से एक छोटा-सा टिफिन सर्विस का काम शुरू किया, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति सुधरने लगी।
एक दिन, मोहल्ले में होली का त्योहार था। राधा ने सभी को अपने घर बुलाया। आसिफ और उसके परिवार ने पहली बार मोहल्ले के त्योहार में हिस्सा लिया। रंगों और हँसी के बीच, राधा ने देखा कि आसिफ ने अपनी छोटी बहन को गोद में उठाकर उसे रंग लगाया। उस पल में राधा की आँखें नम हो गईं। उसे लगा कि उसका छोटा-सा प्रयास एक परिवार को न सिर्फ़ आर्थिक रूप से मजबूत कर रहा था, बल्कि मोहल्ले को और करीब ला रहा था।
नैतिक शिक्षा। यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची इंसानियत और प्यार किसी भी दीवार को तोड़ सकते हैं। छोटे-छोटे प्रयास और एक-दूसरे का साथ, समाज में बदलाव ला सकता है। हमें दूसरों की मदद करने से कभी नहीं हिचकिचाना चाहिए, क्योंकि एक दिल से निकली मदद, कई दिलों तक पहुँचती है।
