बीज से बरगद तक

मध्य प्रदेश के एक छोटे से गाँव, सतना, में बस्ती थी शांति। शांति की उम्र थी करीब पैंतालीस साल, और वह गाँव में अपनी सादगी और दूसरों की मदद करने की आदत के लिए जानी जाती थी। उसका घर गाँव के उस छोर पर था, जहाँ एक पुराना तालाब था। तालाब के किनारे एक छोटा-सा मंदिर था, जहाँ शांति हर सुबह माथा टेकने जाती। शांति के पति, रघु, गाँव के हाट में एक छोटी-सी किराने की दुकान चलाते थे। उनका एक बेटा था, सोलह साल का नील, जो स्कूल में पढ़ता था और अपने माता-पिता का गर्व था।

गाँव में एक बड़ी समस्या थी, बेरोजगारी। नौजवानों को काम की तलाश में शहरों की ओर पलायन करना पड़ता था। शांति को यह देखकर बहुत दुख होता। वह अक्सर सोचती कि अगर गाँव में ही कुछ काम शुरू हो, तो नील जैसे बच्चों को अपने घर-परिवार से दूर न जाना पड़े। लेकिन गाँव में न तो कोई बड़ा कारखाना था, न ही कोई ऐसी योजना, जो नौजवानों को जोड़े रखे।

एक दिन, गाँव में एक मेले का आयोजन हुआ। मेले में तरह-तरह के स्टॉल थे, जिनमें हस्तशिल्प, मिट्टी के बर्तन, और स्थानीय खाने की चीजें बिक रही थीं। शांति ने देखा कि एक स्टॉल पर कुछ महिलाएँ अपने हाथों से बने बाँस के उत्पाद बेच रही थीं, टोकरियाँ, चटाइयाँ, और छोटे-छोटे सजावटी सामान। ये महिलाएँ पास के एक गाँव से आई थीं और उनकी मेहनत को देखकर शांति का मन भर आया। उसने उनसे बात की और जाना कि उन्होंने एक छोटा-सा सहकारी समूह बनाया था, जिसके जरिए वे अपने उत्पाद शहरों में बेचती थीं।

शांति के मन में एक विचार आया। उसने सोचा, क्यों न अपने गाँव में भी ऐसा कुछ शुरू किया जाए? गाँव में बाँस की खेती होती थी, और कई लोग बुनाई का काम जानते थे। उसने अपने पति रघु से इस बारे में बात की। रघु पहले तो हिचकिचाए। उन्होंने कहा, “शांति, यह आसान नहीं होगा। हमें पैसों की जरूरत पड़ेगी, और लोग शायद साथ न दें।” लेकिन शांति ने हार नहीं मानी। उसने नील को अपनी योजना बताई। नील, जो स्कूल में अपने दोस्तों के बीच एक लीडर था, इस विचार से उत्साहित हो गया। उसने कहा, “माँ, मैं अपने दोस्तों को इकट्ठा करूँगा। हम सब मिलकर कुछ न कुछ करेंगे।”

शांति ने गाँव के कुछ नौजवानों और महिलाओं को अपने घर बुलाया। उसने उन्हें मेले में देखे बाँस के उत्पादों की बात बताई और एक सहकारी समूह शुरू करने का सुझाव दिया। पहले तो कुछ लोगों को यकीन नहीं हुआ। एक नौजवान, विक्रम, ने कहा, “शांति दी, हमारी बनाई चीजें कौन खरीदेगा? और हमें बेचने का तरीका भी तो सीखना होगा।” शांति ने धैर्य से जवाब दिया, “हर बड़ा काम छोटे कदम से शुरू होता है। अगर हम एकजुट हों, तो कुछ भी असंभव नहीं।”

शांति और नील ने मिलकर काम शुरू कर दिया। गाँव के कुछ बुजुर्गों ने बाँस की बुनाई सिखाई, और नील ने अपने स्कूल के शिक्षक की मदद से इंटरनेट पर बाँस के उत्पादों की माँग के बारे में जानकारी जुटाई। शांति ने पास के शहर में एक व्यापारी, श्रीकांत जी, से संपर्क किया, जो स्थानीय हस्तशिल्प को बढ़ावा देने में रुचि रखते थे। श्रीकांत ने गाँव के समूह को बाँस की टोकरियाँ और सजावटी सामान बनाने का एक छोटा-सा ऑर्डर दिया।

शुरुआत छोटी थी, लेकिन मेहनत रंग लाई। गाँव के नौजवानों ने दिन-रात मेहनत की। शांति और गाँव की महिलाएँ बुनाई का काम करतीं, जबकि नील और उसके दोस्त ऑर्डर की पैकिंग और डिलीवरी में मदद करते। धीरे-धीरे, उनके उत्पादों की माँग बढ़ने लगी। श्रीकांत ने उन्हें एक बड़े मेले में अपने स्टॉल लगाने का मौका दिया। मेला गाँव के लिए एक बड़ा अवसर था। नील ने अपने दोस्तों के साथ स्टॉल को खूबसूरती से सजाया, और शांति ने वहाँ आने वाले ग्राहकों को अपने गाँव की मेहनत की कहानी सुनाई।

मेले में उनके उत्पाद खूब बिके। लोगों ने न सिर्फ उनकी टोकरियों की तारीफ की, बल्कि उनकी मेहनत और एकजुटता की कहानी से भी प्रभावित हुए। इस सफलता ने गाँव के नौजवानों में नई ऊर्जा भरी। उन्होंने अपने समूह का नाम रखा, “बरगद का बीज”। शांति ने कहा, “जैसे एक छोटा सा बीज बड़ा होकर बरगद बन जाता है, वैसे ही हमारी यह छोटी सी कोशिश गाँव को नई ऊँचाइयों तक ले जाएगी।”

कुछ महीनों बाद, समूह की कमाई से गाँव में एक छोटा-सा प्रशिक्षण केंद्र खोला गया, जहाँ नौजवानों को बुनाई और अन्य हस्तशिल्प सिखाए जाते। नील ने स्कूल में एक प्रोजेक्ट शुरू किया, जिसमें वह अपने दोस्तों को स्थानीय कला और व्यवसाय के बारे में जागरूक करता। शांति को देखकर गाँव की दूसरी महिलाएँ भी आगे आईं, और धीरे-धीरे गाँव में पलायन की समस्या कम होने लगी।

एक शाम, जब शांति तालाब के किनारे बैठी थी, नील उसके पास आया। उसने कहा, “माँ, तुमने मुझे सिखाया कि मेहनत और एकता से कुछ भी हो सकता है। मैं बड़ा होकर अपने गाँव के लिए और काम करूँगा।” शांति की आँखें नम हो गईं। उसने महसूस किया कि उसकी छोटी-सी कोशिश ने न सिर्फ गाँव को बदला, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मजबूत नींव रखी।

नैतिक शिक्षा। यह कहानी हमें सिखाती है कि छोटी-छोटी कोशिशें, अगर एकजुटता और मेहनत के साथ की जाएँ, तो बड़े बदलाव ला सकती हैं। हमें अपने समुदाय के लिए जिम्मेदारी लेनी चाहिए और स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके अपने गाँव और समाज को समृद्ध करना चाहिए। एक बीज से बरगद बनने की यात्रा विश्वास और सहयोग से ही संभव है।

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