एक गाँव में गप्पू नाम का चतुर गिलहरी रहता था। वह जंगल के राजा शेर, शेर सिंह, को बहुत होशियार मानता था। एक दिन गप्पू ने फैसला किया कि वह भी उतना ही ताकतवर बनेगा। जंगल में घूमते हुए उसने लोहार की दुकान देखी। अंदर लोहार हथौड़े से लोहे को पीट रहा था। गप्पू को लगा कि वही ताकत पाने का रास्ता है।
वह दुकान में घुसा और बोला, “मुझे भी उतना ही ताकतवर बना दो जितना शेर सिंह है!” लोहार हंस पड़ा और बोला, “ताकत बाहों में नहीं, दिमाग में होती है।” गप्पू को समझ नहीं आया। लोहार ने समझाते हुए कहा, “तेरी चतुराई ही तेरी ताकत है।”
गप्पू को यकीन नहीं हुआ। गुस्से में उसने दुकान में हंगामा कर दिया। शोर सुनकर एक बिल्ली दुकान में घुसी। गप्पू डर के मारे एक मिट्टी के घड़े में छिप गया। बिल्ली ने घड़े को पलट दिया और उसमें से धूल उड़ने लगी। बिल्ली घबराकर भाग गई। गप्पू बाहर निकला और सोचा, “लोहार सही था। मेरी चतुराई ने ही मुझे बचाया!”
उस दिन से गप्पू ने अपनी चतुराई का इस्तेमाल जंगल के अन्य जानवरों की मदद करने में लगा। कमजोर जानवरों को शिकारियों से बचाता, सूखे में पानी ढूंढकर लाता। धीरे-धीरे पूरा जंगल गप्पू की बुद्धिमानी का लोहा मानने लगा। एक बार बाढ़ आई तो गप्पू ने सूखे पेड़ों को जोड़कर पुल बना दिया, जिससे सभी जानवर नदी पार कर पाए। तब गप्पू को एहसास हुआ कि असली ताकत दूसरों की मदद करने में है।
नैतिक शिक्षा। ताकत सिर्फ बाहुबल नहीं, बुद्धि और दूसरों की मदद करने का जज्बा भी है।
