
जंगल में गर्जनसिंह नाम का एक बहुत बड़ा और घमंडी शेर राज करता था। वह रोज एक जानवर को बुलाता और कहता, “मेरे खाने के लिए आ जाओ!” सब डरते थे, पर कोई कुछ नहीं कर पाता था।
एक छोटा-सा खरगोश, जिसका नाम था चतुरू, बहुत चालाक और हिम्मत वाला था। जब उसकी बारी आई तो उसने सोचा, “मैं इस डर को हमेशा के लिए खत्म कर दूँगा।”
चतुरू जान-बूझकर देर से गर्जनसिंह के पास पहुँचा। शेर गुस्से में गरजा, “तू इतनी देर से क्यों आया, छोटे खरगोश?” चतुरू ने डर का अच्छा नाटक किया और बोला, “महाराज, रास्ते में एक और बहुत बड़ा शेर मिला। उसने कहा, ‘यह जंगल अब मेरा है, गर्जनसिंह कुछ नहीं है!’ उसने मुझे भी मारने की कोशिश की, पर मैं किसी तरह भाग निकला।”
गर्जनसिंह को बहुत गुस्सा आया। उसने गरजकर कहा, “चल, मुझे उस शेर के पास ले चल! मैं उसे अभी सबक सिखाऊँगा!” चतुरू मन ही मन मुस्कुराया और बोला, “जी महाराज, चलिए।”
चतुरू शेर को जंगल के बीच एक पुराना गहरा कुआँ दिखाने ले गया। कुएँ का पानी बहुत नीचे था और उसमें शेर का परछाई साफ दिखता था। चतुरू ने कहा, “महाराज, वह शेर इस कुएँ में रहता है। आप झाँककर देखिए।”
गर्जनसिंह ने कुएँ में झाँका। उसे पानी में अपना ही परछाई दिखा, बड़ा, डरावना और गरजता हुआ। उसने सोचा यही दूसरा शेर है। गुस्से में उसने जोर से गरज कर कहा, “बाहर आ, डरपोक!” और फिर गर्जनसिंह खुद कुएँ में कूद पड़ा ताकि उस “दूसरे शेर” को मार सके!
पानी में बहुत जोर की छपाक हुई। चतुरू ऊपर से देखकर हँसा और बोला, “महाराज, आप खुद ही सबसे बड़े शेर थे। अब जंगल सबका है!”
चतुरू दौड़कर सब जानवरों के पास गया और बोला, “अब डरने की जरूरत नहीं! हम सब मिलकर खुशी से रहेंगे।” सारे जानवरों ने चतुरू को गले लगाया और उसे “छोटा हीरो” कहा।
उस दिन के बाद जंगल में कोई राजा नहीं रहा। सब मिल-जुल कर, एक-दूसरे की मदद करके रहने लगे।
नैतिक शिक्षा: घमंड और गुस्से में आकर जल्दबाजी करने से खुद का ही नुकसान होता है। बुद्धि और हिम्मत से बड़ी से बड़ी मुसीबत हल हो जाती है।
