चतुर खरगोश और लालची भालू

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एक घने जंगल में, जहाँ पेड़ आसमान को छूते थे और फूलों की महक हवा में तैरती थी, एक चतुर खरगोश रहता था, जिसका नाम था चंचल। चंचल अपनी तेज बुद्धि और हाजिरजवाबी के लिए मशहूर था। उसी जंगल में एक भालू रहता था, जिसका नाम था बलराम। बलराम ताकतवर था, पर उसका लालच उसे हर बार मुसीबत में डाल देता था।

जंगल के बीचों-बीच एक प्राचीन बरगद का पेड़ था, जिसके नीचे एक छोटा सा तालाब था। तालाब में मछलियाँ तैरती थीं, और पास ही एक मधुमक्खी का छत्ता था, जिसमें शहद की मिठास हवा में घुलती थी। एक दिन, बलराम तालाब के किनारे बैठा मछलियों को ललचाई नजरों से देख रहा था। उसने सोचा, “अगर मैं सारी मछलियाँ पकड़ लूँ, तो मुझे कई दिनों तक भोजन की चिंता नहीं करनी पड़ेगी!”

चंचल, जो पास ही एक झाड़ी में आराम कर रहा था, ने बलराम की बात सुन ली। वह तुरंत समझ गया कि बलराम का लालच तालाब की मछलियों के लिए खतरा बन सकता है। चंचल ने सोचा कि उसे कुछ करना होगा। वह धीरे से बलराम के पास गया और बोला, “बलराम भाई, तुम इतने उदास क्यों बैठे हो? क्या बात है?”

बलराम ने अपनी योजना बताई, “चंचल, मैं इस तालाब की सारी मछलियाँ पकड़ना चाहता हूँ। इससे मेरा पेट लंबे समय तक भरा रहेगा।”

चंचल ने मुस्कुराते हुए कहा, “यह तो बहुत अच्छा विचार है, बलराम! लेकिन क्या तुमने उस छत्ते को देखा?” उसने बरगद के पेड़ की ओर इशारा किया, जहाँ मधुमक्खियाँ गूँज रही थीं। “वहाँ इतना शहद है कि तुम कई महीनों तक मजे से खा सकते हो। मछलियाँ तो रोज पकड़ी जा सकती हैं, लेकिन शहद एक बार मिल जाए, तो बात ही अलग है!”

बलराम की आँखों में लालच की चमक आ गई। उसने कहा, “तुम सही कह रहे हो, चंचल! शहद तो मछलियों से भी ज्यादा स्वादिष्ट है। लेकिन छत्ते तक कैसे पहुँचूँ? वह तो बहुत ऊँचा है।”

चंचल ने एक योजना बनाई। उसने कहा, “तुम्हें बस मेरी बात माननी होगी। मैं एक रस्सी लाता हूँ, और तुम उसे पेड़ की डाल से बाँध देना। फिर तुम रस्सी पकड़कर छत्ते तक पहुँच सकते हो।”

बलराम को यह योजना पसंद आई। चंचल ने जंगल से एक मजबूत रस्सी ढूंढी और बलराम को दे दी। बलराम ने रस्सी को पेड़ की डाल से बाँधा और उसका एक सिरा अपने कमर से बाँध लिया। चंचल ने कहा, “अब तुम रस्सी पकड़कर ऊपर चढ़ो, और शहद ले आओ!”

बलराम उत्साह में रस्सी पकड़कर चढ़ने लगा, लेकिन जैसे ही वह छत्ते के पास पहुँचा, मधुमक्खियों ने उस पर हमला कर दिया। बलराम चिल्लाया, “अरे, ये मधुमक्खियाँ तो मुझे काट रही हैं!” वह घबराहट में रस्सी छोड़कर नीचे गिर पड़ा। सौभाग्य से, वह ज्यादा चोटिल नहीं हुआ, लेकिन उसका लालच अब उसे मूर्खता लगने लगा।

चंचल पास खड़ा हँस रहा था। उसने कहा, “बलराम भाई, तुम्हारा लालच तुम्हें ले डूबा। अगर तुम मछलियों को पकड़ने की बजाय संतुष्ट रहते और थोड़ा-थोड़ा शहद लेने की कोशिश करते, तो शायद यह नौबत न आती।”

बलराम ने शर्मिंदगी से सिर झुका लिया। उसने चंचल से माफी माँगी और वादा किया कि वह अब लालच नहीं करेगा। उस दिन के बाद, बलराम ने केवल उतना ही लिया, जितना उसे जरूरत थी, और जंगल के अन्य जानवरों के साथ मिल-जुलकर रहने लगा।

नैतिक शिक्षा: लालच हमेशा हानि पहुँचाता है; संतोष और समझदारी से ही सुख प्राप्त होता है।

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