पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गाँव, सुंदरबन, में बसी थी रीता। रीता की उम्र थी करीब सैंतीस साल, और वह अपने गाँव में अपनी मेहनत और हौसले के लिए जानी जाती थी। उसका घर मैंग्रोव जंगलों के किनारे एक छोटी-सी बस्ती में था, जहाँ हर दिन ज्वार-भाटे की लहरें और प्रकृति की चुनौतियाँ जीवन का हिस्सा थीं। रीता एक मछुआरे की विधवा थी। उसके पति, सुब्रत, चार साल पहले एक तूफान में समुद्र में खो गए थे। अब वह अपने दो बच्चों—चौदह साल की मधु और नौ साल के बिप्लब—के साथ अकेली थी।
सुंदरबन में जीवन आसान नहीं था। बाढ़, तूफान, और जंगली जानवरों का खतरा हमेशा मंडराता रहता था। रीता दिन में मछलियाँ पकड़ने के लिए नदी में जाती और शाम को गाँव के बाजार में उन्हें बेचती। उसकी कमाई से घर का खर्च मुश्किल से चलता, लेकिन वह अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए हर संभव कोशिश करती। मधु को पढ़ाई का शौक था, और वह सपना देखती थी कि एक दिन वह शिक्षिका बनेगी। बिप्लब, हालांकि छोटा था, लेकिन अपनी माँ की मदद के लिए मछलियाँ साफ करने और जाल बुनने में हाथ बँटाता।
गाँव में एक और समस्या थी—बिजली की कमी। सूरज ढलते ही गाँव अंधेरे में डूब जाता। बच्चे मिट्टी के तेल के लैंप की रोशनी में पढ़ते, जो न सिर्फ़ महँगा था, बल्कि खतरनाक भी। रीता को यह बात बहुत परेशान करती। एक रात, जब मधु लैंप की मद्धम रोशनी में किताब पढ़ रही थी, उसने अपनी माँ से कहा, “माँ, अगर हमारे गाँव में बिजली होती, तो मैं और अच्छे से पढ़ पाती।” रीता ने उसकी बात सुनी और मन ही मन ठान लिया कि वह कुछ करेगी।
एक दिन, गाँव में एक गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) की कार्यशाला हुई। इसमें एक इंजीनियर, सायन, आए थे, जो सौर ऊर्जा (सोलर पावर) के बारे में बता रहे थे। रीता ने कार्यशाला में हिस्सा लिया और जाना कि सोलर पैनल से सस्ती और सुरक्षित बिजली बनाई जा सकती है। उसने सायन से बात की और अपनी चिंता साझा की, “हमारे गाँव में बिजली नहीं है। मेरे बच्चे और गाँव के दूसरे बच्चे अंधेरे में पढ़ते हैं। क्या हम सोलर लाइट्स का इंतजाम कर सकते हैं?” सायन ने रीता की बात ध्यान से सुनी और वादा किया कि वह मदद करेंगे।
सायन ने गाँव में एक छोटा-सा सोलर प्रोजेक्ट शुरू करने का प्रस्ताव रखा। इसके लिए गाँव वालों को कुछ पैसे और श्रमदान देना था। रीता ने गाँव की पंचायत में यह बात उठाई, लेकिन कुछ लोग इसके खिलाफ थे। एक बुजुर्ग, मंगल दा, ने कहा, “हम तेल के लैंप से काम चला लेते हैं। यह नया तरीका महँगा होगा, और हमें नहीं पता कि यह काम करेगा भी या नहीं।” रीता ने हिम्मत नहीं हारी। उसने गाँव की महिलाओं और बच्चों को इकट्ठा किया और समझाया, “यह हमारे बच्चों के भविष्य की बात है। अगर हम अब नहीं बदले, तो हमारे बच्चे हमेशा अंधेरे में रहेंगे।”
मधु और बिप्लब ने भी अपनी माँ का साथ दिया। मधु ने स्कूल में अपने दोस्तों को सोलर पावर के फायदों के बारे में बताया, और बिप्लब ने गाँव के बच्चों के साथ मिलकर एक छोटा-सा नाटक तैयार किया, जिसमें उन्होंने दिखाया कि बिजली की रोशनी कैसे उनके जीवन को बेहतर बना सकती है। धीरे-धीरे, गाँव वाले रीता के साथ आ गए। सायन ने अपने संगठन के जरिए कुछ सोलर लैंप और पैनल दान किए, और गाँव वालों ने मिलकर बाकी पैसे जुटाए।
कई हफ्तों की मेहनत के बाद, गाँव में पहला सोलर लैंप जला। उस रात, जब मधु और बिप्लब ने अपनी किताबें सोलर लाइट की रोशनी में खोलीं, रीता की आँखें खुशी से चमक उठीं। जल्द ही, गाँव के हर घर में सोलर लैंप पहुँच गए। बच्चे अब रात में आसानी से पढ़ सकते थे, और महिलाएँ अपने कामों को देर तक कर सकती थीं। रीता ने गाँव की महिलाओं को सोलर लैंप की देखभाल और मरम्मत का प्रशिक्षण लेने के लिए प्रेरित किया। उसने खुद भी यह हुनर सीखा और गाँव में एक छोटा-सा सोलर रिपेयर सेंटर शुरू किया।
एक साल बाद, मधु ने जिला स्तर की एक परीक्षा में पहला स्थान हासिल किया। जब वह पुरस्कार लेने मंच पर गई, तो उसने अपनी माँ को धन्यवाद दिया और कहा, “मेरी माँ ने मुझे न सिर्फ़ किताबें दीं, बल्कि रोशनी भी दी।” उस दिन, रीता की आँखों में गर्व के आँसू थे। उसने महसूस किया कि उसकी छोटी-सी कोशिश ने न सिर्फ़ उसके बच्चों का भविष्य रोशन किया, बल्कि पूरे गाँव को एक नई दिशा दी।
नैतिक शिक्षा। यह कहानी हमें सिखाती है कि मुश्किलों के बीच भी एक छोटी-सी पहल बड़े बदलाव ला सकती है। हिम्मत, सामुदायिक सहयोग, और नई तकनीक को अपनाने से हम अपने और अपने समाज के भविष्य को बेहतर बना सकते हैं। रोशनी सिर्फ़ बिजली से नहीं, बल्कि हौसले और एकता से भी फैलती है।
