सियार और ढोल

The Jackal and the Drum

जंगल के बीच में एक पुराना युद्धक्षेत्र था। वहाँ टूटे-फूटे रथ, भाले और एक बहुत बड़ा युद्ध-ढोल पड़ा रहता था। हवा के तेज झोंके आने पर उस ढोल में जबरदस्त “धूम-धूम” की आवाज गूँजती थी, मानो कोई विशालकाय राक्षस गरज रहा हो।

एक रात एक भूखा सियार, नाम था लालचंद, उस रास्ते से गुजरा। अचानक तेज हवा चली और ढोल ने “धूम… धूम…” की भयानक आवाज की। सियार की रोंगटे खड़े हो गए। उसने सोचा, “निश्चय ही यहाँ कोई बहुत मोटा-ताजा जानवर है जो इतनी जोर से साँस ले रहा है! अगर मैं इसे मार सका तो कई महीनों तक पेट भर खाऊँगा!”

लालचंद डरते-डरते आगे बढ़ा। ढोल फिर बोला, “धूम-धूम!” सियार ने पूँछ सिकोड़ी और फुसफुसाया, “ऐ मोटे जानवर! बाहर आ, वरना मैं तेरी खाल उधेड़ दूँगा!” कोई जवाब नहीं आया। सियार ने हिम्मत बटोरी और धीरे से ढोल के पास पहुँचा। उसने देखा कि ढोल का चमड़ा फटा हुआ है और अंदर कुछ भी नहीं, सिर्फ हवा।

तब सियार को समझ आया कि वह डर के मारे खुद ही अपना शिकार खो बैठा था। उसने पास ही घास में एक छोटा-सा खरगोश देखा जो डर के मारे काँप रहा था। सियार ने खरगोश को पकड़ लिया और हँसते हुए बोला, “मूर्ख ढोल! तेरी वजह से मैंने अपना असली शिकार लगभग छोड़ दिया था।”

पर जैसे ही सियार खरगोश को मुँह में दबाकर चलने लगा, एक तेज तीर हवा को चीरता हुआ आया और सियार के पाँव में लग गया। वह चीखा और खरगोश छूटकर भाग गया। दूर पेड़ पर एक शिकारी बैठा था जिसने सोचा था कि ढोल की आवाज कोई बड़ा जानवर कर रहा है।

सियार लंगड़ाता हुआ भागा। पीछे ढोल फिर हवा से बज उठा, “धूम-धूम!” सियार ने पीछे मुड़कर देखा और कड़वाहट से बोला, “तेरी आवाज ने मुझे पहले डराया, फिर भूखा रखा, और अब लंगड़ा भी कर दिया। सचमुच तू सबसे बड़ा धोखा है!”

उस रात से लालचंद ने कभी बिना देखे-परखे किसी आवाज पर विश्वास नहीं किया।

नैतिक शिक्षा: बिना जाँचे-परखे छोटी बात को बड़ा समझकर डरना या लालच करना मूर्खता है। पहले सच्चाई देखो, फिर विश्वास करो।

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