किरण की किरण

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव, बेलापुर, में गंगा के किनारे बसी एक बस्ती थी। गाँव की सुबह सूरज की पहली किरणों के साथ शुरू होती थी, जब मंदिर की घंटियाँ बजती थीं और गायों की रँभाहट हवा में गूँजती थी। गाँव के बीचों-बीच एक पुराना बरगद का पेड़ था, जिसके नीचे पंचायत की बैठकें होती थीं। यहीं, इस गाँव में, रहती थी किरण, एक ऐसी युवती, जिसके दिल में सपनों का सूरज चमकता था, पर जिसे समाज की परछाइयों ने ढक रखा था।

किरण का घर गाँव के आखिरी छोर पर था। मिट्टी का बना एक छोटा-सा मकान, जिसकी दीवारें समय के साथ काई से हरी हो चुकी थीं। घर के आँगन में तुलसी का पौधा था, जिसे सुनीता हर सुबह जल चढ़ाती थी। किरण की माँ, सुनीता, एक साधारण गृहिणी थी, जो अपनी बेटी के लिए एक अच्छा रिश्ता ढूँढने में लगी रहती थी। “किरण, अब तो उम्र हो चली है। देख, शर्मा जी के बेटे का रिश्ता आया है। अच्छा लड़का है, शहर में नौकरी करता है,” सुनीता ने एक दिन रसोई में चूल्हे पर रोटी सेंकते हुए कहा। किरण ने चुपचाप सिर झुका लिया। वह जानती थी कि माँ का इरादा बुरा नहीं था, पर उसका मन कहीं और था।

वह गाँव की उन लड़कियों को पढ़ाना चाहती थी, जिन्हें स्कूल जाने का मौका नहीं मिलता था। गाँव में एक छोटा-सा स्कूल तो था, पर वहाँ केवल लड़के पढ़ने जाते थे। लड़कियों को घर के काम या खेतों में भेज दिया जाता था। किरण ने कॉलेज की पढ़ाई पूरी की थी, लेकिन गाँव में नौकरी का कोई अवसर नहीं था। फिर भी, उसने हार नहीं मानी। हर शाम, वह गाँव की कुछ लड़कियों को बरगद के पेड़ के नीचे पढ़ाने लगी थी।

लक्ष्मी उनमें सबसे चंचल थी। उसकी आँखों में जिज्ञासा की चमक थी। “दीदी, ये ‘अक्षर’ क्या होता है? क्या इससे हम भी किताबें लिख सकते हैं?” लक्ष्मी ने एक दिन पूछा, उसकी छोटी-सी डायरी में टेढ़े-मेढ़े अक्षर लिखते हुए। किरण ने मुस्कुराकर उसका सिर सहलाया, “हाँ, लक्ष्मी। अक्षर तुम्हें दुनिया की हर कहानी पढ़ने और अपनी कहानी लिखने की ताकत देंगे।”

लेकिन गाँव के सरपंच जी को किरण का यह काम पसंद नहीं था। एक दिन पंचायत की बैठक में उन्होंने गरजते हुए कहा, “ये किरण क्या नया तमाशा शुरू कर रही है? लड़कियों को पढ़ाकर क्या होगा? उनकी जगह तो घर में है, चूल्हे-चौके में। ये सब शहरों की हवा है, जो हमारे गाँव को बिगाड़ रही है।” कुछ लोग उनके समर्थन में सिर हिलाने लगे, पर किरण के बाबूजी, रामलाल, चुप रहे। रामलाल मेहनती किसान थे, जो अपनी बेटी से बहुत प्यार करते थे। लेकिन वह गाँव की परंपराओं और सरपंच जी के प्रभाव से भी डरते थे।

उसी शाम, किरण घर लौटी तो सुनीता ने उसे डाँटते हुए कहा, “किरण, तू ये सब क्यों कर रही है? सरपंच जी कह रहे थे कि तेरे इस पढ़ाने से गाँव की लड़कियाँ बिगड़ जाएँगी। अब तू रिश्तों की बात सुन, नहीं तो बदनामी होगी।” किरण की आँखें भर आईं। उसने कहा, “माँ, क्या गलत है अगर मैं लक्ष्मी और दूसरी लड़कियों को पढ़ाना चाहती हूँ? क्या उनके सपने मायने नहीं रखते?”

उसी रात, किरण के बचपन का दोस्त अनिल गाँव आया। अनिल शहर में शिक्षक था और किरण के सपनों को समझता था। वह अक्सर गाँव आता था, अपने पुराने दोस्तों से मिलने। जब उसने किरण की परेशानी सुनी, तो उसने कहा, “किरण, तुम जो कर रही हो, वो गलत नहीं है। लेकिन गाँव के लोगों को समझाने के लिए तुम्हें कुछ बड़ा करना होगा। सिर्फ पढ़ाना काफी नहीं, तुम्हें दिखाना होगा कि शिक्षा से इन लड़कियों का भविष्य बदल सकता है।”

अनिल की बातों ने किरण को नई प्रेरणा दी। उसने फैसला किया कि वह गाँव में एक छोटा-सा समारोह आयोजित करेगी, जिसमें उसकी पढ़ाई हुई लड़कियाँ कुछ प्रदर्शन करेंगी, कविता, नाटक, और गणित के सवाल। वह चाहती थी कि गाँव वाले देखें कि शिक्षा लड़कियों के लिए कितनी जरूरी है।

समारोह की तैयारियाँ जोर-शोर से शुरू हुईं। लक्ष्मी और उसकी सहेलियाँ उत्साह से भरी थीं। किरण ने दिन-रात मेहनत की। उसने अपनी छोटी-सी बचत से कागज, किताबें, और कुछ रंग-बिरंगे कपड़े खरीदे, ताकि लड़कियाँ नाटक के लिए तैयार हो सकें। लेकिन सरपंच जी को यह सब पसंद नहीं आया। उन्होंने पंचायत में फिर से आवाज उठाई, “ये किरण हमारे गाँव की मर्यादा को चुनौती दे रही है। इस समारोह को रोकना होगा।”

रामलाल अब दुविधा में थे। एक तरफ उनकी बेटी थी, जिसके सपनों पर उन्हें भरोसा था, और दूसरी तरफ गाँव की पंचायत थी, जिसका दबाव वे झेल नहीं पा रहे थे। आखिरकार, उन्होंने किरण से कहा, “बेटी, मैं तुम्हारे साथ हूँ, लेकिन अगर गाँव वाले नाराज हुए, तो हमारी इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी।”

किरण ने बाबूजी का हाथ पकड़ा और कहा, “बाबूजी, मुझे सिर्फ एक मौका दीजिए। अगर मैं गाँव वालों को समझा नहीं पाई, तो मैं ये सब बंद कर दूँगी।”

समारोह का दिन आ गया। बरगद के पेड़ के नीचे एक छोटा-सा मंच सजाया गया था। गाँव के लोग उत्सुकता और संदेह के साथ वहाँ जमा हुए। लक्ष्मी ने एक कविता सुनाई, जिसमें उसने अपने सपनों को शब्दों में पिरोया। दूसरी लड़कियों ने एक नाटक प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने दिखाया कि कैसे एक पढ़ी-लिखी लड़की अपने परिवार और गाँव का नाम रोशन कर सकती है। किरण ने अंत में एक छोटा-सा भाषण दिया, “हमारी बेटियाँ बोझ नहीं, बल्कि गाँव की ताकत हैं। अगर हम उन्हें पढ़ाएँगे, तो वे न केवल अपने परिवार, बल्कि पूरे गाँव का भविष्य बदल सकती हैं।”

लक्ष्मी की कविता और नाटक ने लोगों के दिल छू लिए। सरपंच जी चुप थे। कुछ बुजुर्गों की आँखें नम थीं। सुनीता ने अपनी बेटी को गर्व से देखा। रामलाल ने आगे बढ़कर किरण को गले लगाया और कहा, “बेटी, मुझे तुम पर गर्व है।”

समारोह के बाद, गाँव में बदलाव की हवा चलने लगी। सरपंच जी ने भी अपनी सोच बदली और गाँव के स्कूल में लड़कियों के लिए एक अलग कक्षा शुरू करने की बात कही। किरण का सपना अब केवल उसका नहीं, बल्कि पूरे गाँव का सपना बन गया था।

नैतिक शिक्षा। यह कहानी हमें सिखाती है कि बदलाव लाने के लिए हिम्मत और विश्वास की जरूरत होती है। समाज की पुरानी मान्यताओं को चुनौती देना आसान नहीं, पर अगर हम अपने सपनों पर भरोसा रखें और दूसरों को उनके महत्व को समझाएँ, तो हम न केवल अपना, बल्कि पूरे समाज का भविष्य बदल सकते हैं। शिक्षा वह किरण है, जो अंधेरे को दूर कर सकती है।

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