शेर, बैल और सियार

The Lion the Bull and the Jackals

एक घने जंगल में पिंगलक नाम का एक शक्तिशाली शेर राजा था। उसका रंग सुनहरा था और आवाज इतनी भयानक कि दूर-दूर तक जानवर काँप उठते थे। पिंगलक को अपना कोई सच्चा मित्र नहीं था; सभी उससे डरते थे।

एक दिन जंगल के किनारे एक विशालकाय सांड़ रहने आया। उसका नाम था संजय। संजय का शरीर पहाड़ जैसा था, सींग चमकदार और तेज। उसकी डकार भी इतनी जोर की थी कि पेड़ों के पत्ते झड़ जाते थे। दोनों जब पहली बार मिले तो एक-दूसरे को देखकर रुक गए। शेर को लगा कि यह उससे भी ताकतवर है, और सांड़ को लगा कि यह उससे भी खूंखार है। दोनों ने एक-दूसरे को प्रणाम किया और बातें करने लगे। धीरे-धीरे दोनों में गहरी मित्रता हो गई। रोज शाम को नदी किनारे बैठकर घंटों बातें करते, एक-दूसरे की तारीफ करते और जंगल की चिंता करते।

यह देखकर जंगल के दो सियार भाई – करटक और दमनक – जलने लगे। वे राजा पिंगलक के दरबार में मंत्री थे, पर अब शेर सांड़ के साथ इतना समय बिताता था कि उन्हें कुछ महत्व नहीं मिलता था। दमनक ने करटक से कहा, “यदि यह मित्रता यूँ ही बढ़ी तो हम दोनों भूखों मर जाएँगे। हमें इनकी मित्रता तोड़नी होगी।”

दोनों ने चाल चली। पहले करटक ने शेर के पास जाकर डरते हुए कहा, “महाराज, मुझे डर है कि संजय आपको मार डालना चाहता है। आज सुबह मैंने उसे अपने सींग तेज करते देखा और वह बड़बड़ा रहा था – ‘पिंगलक अब ज्यादा दिन नहीं जीएगा।’” शेर हँसा और बोला, “तुम्हें भ्रम हुआ होगा। संजय मेरा सच्चा मित्र है।”

फिर दमनक संजय के पास गया और काँपते स्वर में बोला, “मित्र, मैं तुम्हारी भलाई के लिए कह रहा हूँ। पिंगलक ने आज अपने नाखून तेज किए और कहा था – ‘संजय का मांस बहुत स्वादिष्ट होगा।’ मैंने सुना है कि वह आज रात तुम पर हमला करने वाला है।”

संजय के मन में संदेह का बीज पड़ गया। उसने अपने सींग और मजबूत कर लिए। शाम को जब दोनों नदी किनारे मिले तो पहले की तरह हँसी-खुशी नहीं थी। पिंगलक ने देखा कि संजय के सींग ज्यादा चमक रहे हैं और उसकी आँखों में कुछ और था। संजय ने देखा कि पिंगलक बार-बार अपने पंजे देख रहा था। दोनों के मन में शंका घर कर गई।

अचानक संजय ने गरजकर कहा, “पिंगलक, मुझे सच बताओ – क्या तुम मुझे मारना चाहते हो?” पिंगलक चौंका और गुस्से में बोला, “तुम्हें यह बेवकूफी कौन सिखा रहा है? मैं तो सोच रहा था कि तुम मुझे मारना चाहते हो!”

बात बढ़ते-बढ़ते दोनों लड़ पड़े। शेर ने अपने पंजों से वार किया, सांड़ ने सींगों से। जंगल में खून की नदियाँ बहने लगीं। घंटों तक युद्ध चला। अंत में दोनों इतने घायल हो गए कि एक पेड़ के नीचे लेट गए, हाँफते हुए, मरने की कगार पर।

तब करटक और दमनक वहाँ आए और चुपके से दोनों के शरीर से मांस के टुकड़े नोंच-नोंच कर खाने लगे। पिंगलक और संजय ने आँखें खोलीं और सब देख लिया। संजय ने धीमी आवाज में कहा, “हम मित्र थे… पर दूसरों की बातों में आकर…” पिंगलक ने आँसू भरी आँखों से कहा, “हमने अपनी मित्रता को स्वयं ही मार डाला।”

दोनों ने अंतिम साँस ली। सियार हँसते हुए बोले, “जब दो मजबूत आपस में लड़ते हैं, तीसरा हमेशा फायदा उठाता है।”

नैतिक शिक्षा: दुश्मनों की चाल और चुगली से सच्ची मित्रता भी टूट सकती है। बिना जाँच-पड़ताल के अफवाह पर विश्वास न करें।

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