नमस्कार दोस्तों। स्वागत है आपका हमारे चैनल ‘हिंदी किस्से कहानियाँ’ में। आज हम लेकर आए हैं एक ऐसी कहानी जहाँ तलवार की धार नहीं, बल्कि दिमाग की धार ने एक मुश्किल का हल निकाला। यह कहानी है एक चतुर सिपाही और एक मूर्ख डाकू की।
एक समय की बात है। राजा विक्रमसेन के राज्य में चारों तरफ शांति और खुशहाली थी। एक दिन राजा ने अपने मंत्री से पूछा, “मंत्री जी, मेरे राज्य का सबसे बहादुर सिपाही कौन है?”
मंत्री बोले, “महाराज, वीरसेन बहुत ही बहादुर है। उसने अकेले ही पाँच डाकुओं को पकड़ा था।” “अच्छा?” राजा ने दिलचस्पी लेते हुए कहा, “उसे मेरे सामने पेश किया जाए।”
जब वीरसेन दरबार में आया तो राजा ने उसकी बहादुरी की तारीफ की और एक सोने की मोहर इनाम में दी। लेकिन तभी दरबार में एक चपरासी ने आकर खबर दी, “महाराज, एक बहुत ही खतरनाक डाकू, भीमसेन, जंगल से गुजरने वाले यात्रियों को लूट रहा है। वो इतना ताकतवर है कि दस आदमी मिलकर भी उसे पकड़ नहीं पाते।”
यह सुनकर राजा ने वीरसेन की तरफ देखा और कहा, “वीरसेन, तुम्हारी बहादुरी की परीक्षा का समय आ गया है। जाओ और उस डाकू को जिंदा या मुर्दा, हमारे सामने पेश करो।” वीरसेन ने सिर झुकाया, “जैसी आज्ञा, महाराज।”
वीरसेन घोड़े पर सवार होकर उस घने जंगल की ओर चल पड़ा जहाँ भीमसेन का आतंक था। कई दिनों की खोजबीन के बाद आखिरकार उसे भीमसेन का ठिकाना मिल ही गया। भीमसेन एक विशालकाय आदमी था, उसके हाथ में एक भारी लोहे का गदा था।
वीरसेन ने उस पर हमला किया। दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। वीरसेन बहादुर था, लेकिन भीमसेन की शारीरिक शक्ति के आगे उसकी एक न चली। भीमसेन ने वीरसेन को पछाड़ दिया और उसकी तलवार छीनकर दूर फेंक दी।
भीमसेन हँसते हुए बोला, “ओ नामर्द। तुझ जैसे को मैंने सैकड़ों को मारा है। अब तेरी बारी है।” वीरसेन समझ गया कि अब लड़ाई से काम नहीं चलेगा, तब उसने अपनी बुद्धि से काम लिया। वह जमीन पर लेटा हुआ बोला, “ठहर भीमसेन। मैं मरने से पहले एक बात कहना चाहता हूँ।” “बोल, जल्दी बोल,” भीमसेन गुर्राया।
वीरसेन बोला, “तू बहुत ताकतवर है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन क्या तुझमें इतनी हिम्मत है कि तू मेरे राजा के सामने एक सच बोल सके?” यह सुनकर भीमसेन को हैरानी हुई। “कौन सा सच?” वीरसेन ने चतुराई से कहा, “मेरे राजा के सामने जाकर कहना कि ‘मैं भीमसेन हूँ और मैंने तेरे सबसे बहादुर सिपाही को हरा दिया है।’ अगर तू यह सच बोलने का साहस रखता है, तो तू सच्चा बहादुर है। नहीं तो, तू केवल शक्ति में मजबूत है, हिम्मत में नहीं।”
भीमसेन, जो बहुत ही घमंडी और मूर्ख था, यह सुनकर फूल गया। उसे लगा कि यह उसकी बहादुरी का सबूत होगा। वह बोला, “क्यों नहीं। मैं तेरे राजा के सामने यह सच कहने जरूर आऊँगा। चल, अभी चलते हैं।” और इस तरह, बिना हथकड़ी-बेड़ियों के, भीमसेन खुद ही वीरसेन के साथ राजदरबार में चल पड़ा।
राजदरबार में पहुँचकर, भीमसेन ने अकड़कर कहा, “हे राजन। मैं भीमसेन हूँ और मैंने तेरे सबसे बहादुर सिपाही को हरा दिया है।” यह सुनकर पूरा दरबार सन्न रह गया। राजा विक्रमसेन ने वीरसेन की ओर देखा।
वीरसेन ने विनम्रतापूर्वक सिर झुकाया और कहा, “महाराज, यह सच है कि उसने मुझे युद्ध में हरा दिया। लेकिन आपने मुझे आदेश दिया था कि उसे ‘जिंदा या मुर्दा’ पकड़कर लाऊँ। और देखिए, मैं उसे जिंदा, बिना किसी जंजीर के, आपके सामने पेश कर रहा हूँ।” राजा को पूरी बात समझते देर न लगी। उनके चेहरे पर मुस्कान फैल गई। उन्होंने वीरसेन की चतुराई की सराहना की और भीमसेन को सजा सुनाई।
और इस तरह, वीरसेन ने अपनी शारीरिक शक्ति से नहीं, बल्कि अपनी बुद्धि और चतुराई से एक मुश्किल काम को आसानी से पूरा किया। इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हर लड़ाई तलवार से नहीं, बल्कि दिमाग से जीती जाती है। अगर हिम्मत और बुद्धि साथ हो, तो कोई भी मुश्किल आसान नहीं हो जाती।
दोस्तों, कैसी लगी आपको यह कहानी? कमेंट में जरूर बताइयेगा। और हाँ, अगर आपको ऐसी ही दिलचस्प कहानियाँ पसंद हैं, तो हमारे चैनल ‘हिंदी किस्से कहानियाँ’ को सब्सक्राइब जरूर करें। बने रहिए ऐसे ही, नई कहानियों के साथ। नमस्कार।
