चाँदी खाने वाला गधा

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मुगल सम्राट अकबर का दरबार अपनी भव्यता और वैभव के लिए प्रसिद्ध था। सुनहरे झरोखों से सजा हुआ दरबार, रंग-बिरंगे कालीनों और रेशमी पर्दों से सुशोभित था। उस दिन दरबार में एक अजीब सा सवाल गूंज रहा था। एक धनी व्यापारी, जिसका नाम मालिक रामदास था, सम्राट के सामने खड़ा था। उसने एक विचित्र शिकायत दर्ज की थी।

“हुजूर,” रामदास ने झुककर कहा, “मेरा गधा चांदी खाता है। हर रात, मैं उसे चांदी की थाली में खाना देता हूं, और सुबह तक वह थाली खाली हो जाती है। लेकिन मेरा गधा अब भी भूखा रहता है। यह कोई जादू है या कोई चाल? मैं समझ नहीं पा रहा। कृपया मेरी मदद करें!”

दरबार में सन्नाटा छा गया। कुछ दरबारी हंसने लगे, तो कुछ ने सिर खुजलाया। एक गधा जो चांदी खाता हो? यह तो असंभव था! अकबर ने अपनी मूंछों को ताव दिया और मुस्कुराते हुए बीरबल की ओर देखा।

“बीरबल, तुम्हारी बुद्धि का क्या कहना! इस रहस्य को सुलझाओ। क्या यह गधा सचमुच चांदी खाता है, या कोई और खेल चल रहा है?”

बीरबल ने अपनी पगड़ी ठीक की और शांत स्वर में बोले, “हुजूर, मुझे इस गधे से मिलने का मौका दीजिए। सत्य जल्दी ही सामने होगा।”

अगले दिन, बीरबल रामदास के घर पहुंचे। रामदास का घर एक छोटा-सा महल जैसा था, जिसमें सोने-चांदी की सजावट थी। बीरबल को एक छोटे से अस्तबल में ले जाया गया, जहां एक साधारण-सा गधा चुपचाप घास चबा रहा था। पास ही एक चांदी की थाली रखी थी, जो खाली थी।

“देखिए, बीरबल जी,” रामदास ने कहा, “हर रात मैं इसमें खाना रखता हूं, और सुबह तक यह गायब हो जाता है।”

बीरबल ने थाली को ध्यान से देखा, फिर गधे की ओर मुड़ा। उन्होंने गधे के दांत और मुंह की जांच की, फिर आसपास की दीवारों और फर्श को देखा। कुछ देर बाद, बीरबल मुस्कुराए और बोले, “रामदास जी, आज रात मैं यहीं रुकूंगा। इस गधे का भोजन मैं खुद देखना चाहता हूं।”

रामदास थोड़ा घबराया, लेकिन सहमति दे दी। रात होने पर, बीरबल ने चांदी की थाली में खाना रखवाया और पास ही एक अंधेरे कोने में छिप गए। आधी रात को, बीरबल ने देखा कि एक व्यक्ति चुपके से अस्तबल में दाखिल हुआ। उसने थाली से खाना निकाला और अपनी थैली में डाल लिया। बीरबल ने उसे पकड़ लिया। वह व्यक्ति कोई और नहीं, बल्कि रामदास का नौकर था।

अगले दिन, बीरबल दरबार में लौटे और पूरी कहानी सुनाई। “हुजूर, यह गधा चांदी नहीं खाता। रामदास का नौकर हर रात खाना चुरा लेता था और थाली खाली छोड़ देता था। रामदास को अपनी धन-दौलत का इतना घमंड था कि उन्होंने अपने नौकर पर शक करने की बजाय गधे पर जादू का इल्जाम लगा दिया।”

दरबार में हंसी की लहर दौड़ गई। अकबर ने ठहाका लगाया और बोले, “बीरबल, तुमने फिर साबित कर दिया कि सच्चाई को पकड़ने के लिए बुद्धि से बड़ा कोई हथियार नहीं! रामदास, अपने नौकर को सजा दो, और आगे से अपनी आंखें खुली रखो।”

रामदास ने शर्मिंदगी से सिर झुकाया और माफी मांगी। बीरबल ने मुस्कुराते हुए कहा, “धन से ज्यादा बुद्धि की कीमत होती है, रामदास जी। इसे कभी न भूलें।”

नैतिक शिक्षा: धन और वैभव से ज्यादा महत्वपूर्ण है बुद्धि और विवेक, जो सत्य को उजागर करता है।

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