चायवाला की कविताएँ

रमेश चायवाला था, पर सिर्फ चाय ही नहीं बनाता था, वो शब्दों की चाय भी पिलाता था। उसकी छोटी सी ठेली बड़े-बड़े सपनों का अड्डा थी। अख़बार पढ़ते नौजवान, दुकान बंद करने का इंतज़ार करते कारीगर, गपशप करतीं अधेड़ महिलाएं, सब उसकी चाय और कविताओं के दीवाने थे।

रमेश ने कभी स्कूल नहीं देखा, मगर शब्दों से मोहब्बत उसके खून में थी। वो रोज़मर्रा की ज़िंदगी को गौर से देखता, लोगों की कहानियों को इकट्ठा करता, और फिर रात के सन्नाटे में उन्हें कविताओं में पिरो देता। उसकी कविताएँ ज़िंदगी के साधारण सुख-दुखों का आईना थीं।

एक दिन, कॉलेज की एक पढ़ी-लिखी लड़की, प्रिया, उसकी ठेली पर आई। रमेश की चाय और उसकी अचानक सुनाई गई कविता ने उसे मंत्रमुग्ध कर दिया। उस दिन से प्रिया रोज़ आने लगी, रमेश से साहित्य पर बातें करती, उसकी कविताओं में छिपे अर्थ खंगालती। उसने रमेश को कविता सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित किया।

सम्मेलन में रमेश का नाम सबसे अलग था। उसकी हकलाती आवाज़ में गाए शब्दों में इतना ज़ोर था कि तालियाँ थमने का नाम नहीं लेती थीं। प्रसिद्धि ने रमेश को छुआ, पर बदला नहीं। वो अपनी ठेली पर बैठा चाय बनाता रहा, कविताएँ लिखता रहा।

एक शाम, प्रिया वहाँ नहीं आई। रमेश को पता चला कि उसके पिता का व्यापार डूब गया है, वो बहुत परेशान हैं। अगले दिन रमेश ने एक कविता लिखी, एक ऐसी कविता जो हार से लड़ने की हिम्मत देती थी, उम्मीद जगाती थी। उसने वो कविता प्रिया के पिता को भेजी।

कुछ दिनों बाद प्रिया लौटी, चेहरे पर मुस्कान लिए। उसके पिता ने हार नहीं मानी थी, रमेश की कविता ने उन्हें नया रास्ता दिखाया था। प्रिया ने बताया कि उसके पिता अब रमेश को अपना गुरु मानते हैं।

नैतिक शिक्षा। इस कहानी से रमेश को ये एहसास हुआ कि शब्दों की ताकत कितनी ज़्यादा है। वो सिर्फ चाय ही नहीं पिलाता, वो उम्मीद पिलाता, हिम्मत पिलाता, ज़िंदगी का असली स्वाद पिलाता। कहानी हमें सिखाती है कि हर व्यक्ति में कोई न कोई खासियत होती है, उसे पहचानकर निखारना ज़रूरी है। साथ ही, शब्दों को हथियार बनाकर हम न सिर्फ खुद को, बल्कि दूसरों की भी ज़िंदगी बेहतर बना सकते हैं।

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