
एक बड़े तालाब में कच्चुआ नाम का एक बहुत ही प्यारा कछुआ रहता था। वह धीरे-धीरे चलता था, पर उसका दिल बहुत बड़ा था। उसके सबसे अच्छे दोस्त थे दो सुंदर हंस, पंखी और पंखू। तीनों दिन भर साथ खेलते, बातें करते और तालाब के किनारे मजे करते थे।
एक साल भयंकर गर्मी पड़ी। तालाब का पानी हर रोज कम होने लगा। मछलियाँ परेशान, मेंढक चिंतित, और कछुआ बहुत उदास हो गया। उसने हंसों से कहा, “अब तालाब सूख जाएगा… मैं कहाँ जाऊँगा?”
पंखी और पंखू ने दूर पहाड़ों के पास एक बहुत बड़ा और ठंडा सरोवर देखा था जहाँ पानी कभी नहीं सूखता। उन्होंने कछुए से कहा, “चिंता मत करो! हम तुम्हें वहाँ ले जाएँगे। हमारे पास एक मोटी छड़ी है। तुम उसे अपने मुँह से मजबूती से पकड़ लेना, हम दोनों सिरों को अपनी चोंच में पकड़कर उड़ेंगे। बस एक शर्त है, रास्ते में मुँह बिल्कुल नहीं खोलना!”
कछुआ बहुत खुश हुआ। उसने वादा किया, “मैं एक शब्द भी नहीं बोलूँगा!”
अगले दिन सुबह-सुबह हंसों ने छड़ी उठाई, कछुए ने बीच में मजबूती से मुँह से पकड़ लिया और तीनों आसमान में उड़ चले। जंगल के सारे जानवर हैरान रह गए। बंदर चिल्लाए, खरगोश ताली बजाने लगे, तोते रंग-बिरंगे पंख फुलाकर चीयर करने लगे।
ऊँट-ऊँट उड़ते हुए जब एक गाँव के ऊपर से गुजरे तो बच्चे बाहर आए और जोर-जोर से चिल्लाने लगे, “देखो-देखो! कछुआ उड़ रहा है! अरे कछुवा, तुझे पंख कहाँ से मिल गए?”
कछुआ यह सुनकर हँस पड़ा। वह बोलना ही चाहता था कि “मेरे अपने पंख नहीं, मेरे दोस्तों के पंख हैं!” पर जैसे ही उसने मुँह खोला, छड़ी छूट गई और वह सीधा नीचे गिरने लगा!
हंस चिल्लाए, “कछुआआआआ!” पर अब कुछ नहीं हो सकता था। कछुआ एक नरम घास के ढेर पर जा गिरा। उसे चोट नहीं लगी, बस थोड़ा साँस फूल गई। हंस तुरंत नीचे उतरे और कछुए को गले लगाया।
कछुआ शर्मिंदा होकर बोला, “मैंने वादा तोड़ा… अपनी बात नहीं रोक सका।” पंखी और पंखू ने मुस्कुराते हुए कहा, “कोई बात नहीं! हम फिर कोशिश करेंगे। इस बार तुम सचमुच चुप रहना!”
कछुए ने सिर हिलाया और अगली बार पूरी यात्रा में एक शब्द भी नहीं बोला। आखिरकार तीनों सुरक्षित नए सरोवर पर पहुँच गए और हमेशा के लिए खुशी-खुशी रहने लगे।
नैतिक शिक्षा: वादा किया है तो उसे निभाओ, खासकर जब दोस्त तुम पर भरोसा करके मदद कर रहे हों। थोड़ी सी चुप्पी बड़ी खुशी लाती है।
