अर्जुन एक शहर में रहने वाला लड़का था। उसे शहर का शोर-शराबा बिल्कुल पसंद नहीं था। वह हमेशा जंगल में जाने का सपना देखता था। एक दिन, गर्मी की छुट्टियों में, उसके माता-पिता उसे अपने गाँव ले गए, जो जंगल के किनारे बसा हुआ था।
गाँव में अर्जुन बहुत खुश था। उसने जंगल में घूमना शुरू किया। जंगल में हरियाली चारों तरफ फैली हुई थी। पेड़ों पर रंग-बिरंगे पक्षी चहचहा रहे थे। अर्जुन ने कभी नहीं सुनी थी ऐसी खूबसूरत आवाज़ें।
उसने एक छोटी सी झोपड़ी देखी और उसमें एक बूढ़ा व्यक्ति बैठा था। अर्जुन ने उनसे पूछा, “दादा जी, आप यहाँ अकेले कैसे रहते हैं?”
बूढ़े व्यक्ति ने मुस्कुराकर कहा, “बेटा, जंगल मेरा घर है। मैं यहाँ शांति से रहता हूँ।” उन्होंने अर्जुन को बताया कि जंगल में हर पेड़-पौधा, हर जीव-जंतु एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है।
बूढ़े व्यक्ति ने अर्जुन को जंगल के बारे में बहुत कुछ बताया। उन्होंने उसे बताया कि कैसे पेड़ हमें ऑक्सीजन देते हैं, कैसे पशु-पक्षी अपना जीवन यापन करते हैं, और कैसे जंगल का संतुलन बहुत महत्वपूर्ण है।
अर्जुन ने ध्यान से सुना। उसने देखा कि कैसे पेड़ों की पत्तियाँ हवा में हिल रही थीं, कैसे पक्षी अपने बच्चों को दाना खिला रहे थे, और कैसे चींटियाँ मिलकर अपना घर बना रही थीं। उसे लगा कि जंगल में एक अनोखी भाषा है, जिसे समझने की ज़रूरत है।
अगले दिन, अर्जुन ने जंगल की सैर के लिए एक छोटी सी डायरी ले ली। उसने जंगल में देखी गई हर चीज़ को लिखा – पेड़ों के रंग, पक्षियों की आवाज़ें, कीड़ों की गतिविधियाँ।
कुछ दिनों बाद, अर्जुन ने महसूस किया कि जंगल में एक अलग ही शांति है। वह शहर के शोर-शराबे से दूर, जंगल की आवाज़ों में खो जाता था। वह पेड़ों की सरसराहट, पक्षियों के गीत, और झरने की ध्वनि को बहुत ध्यान से सुनता था।
गाँव से लौटने के बाद भी, अर्जुन जंगल की यादों को संजोए रखा। उसने शहर में भी पेड़ों की देखभाल करना शुरू किया। उसने अपने घर के पास पौधे लगाए और लोगों को पेड़ों के महत्व के बारे में बताया।
अर्जुन ने सीखा कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं है, बल्कि जीवन का एक अनमोल उपहार है। उसे समझ आया कि प्रकृति की रक्षा करना हम सभी का कर्तव्य है।
नैतिक शिक्षा। प्रकृति का संरक्षण करना हमारा दायित्व है। हमें जंगलों की रक्षा करनी चाहिए और उनका सम्मान करना चाहिए।
