
एक प्राचीन पीपल के पेड़ पर सैकड़ों छोटे-छोटे पक्षी रहते थे। उस पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर जरठ नाम का एक बूढ़ा गिद्ध रहता था। जरठ की आँखें कमजोर हो चुकी थीं, पर उसका मन अभी भी तेज था। वह पक्षियों को सलाह देता और बदले में वे उसे खाना खिलाते थे। सब मिल-जुल कर सुखी थे।
एक दिन एक चालाक बिल्ली, नाम था मायावी, उस पेड़ के नीचे से गुजरी। उसने ऊपर देखा तो मुँह में पानी भर आया। उसने सोचा, “इतने सारे चिड़िया-चिड़ेर एक साथ! अगर मैं कोई तरकीब करूँ तो कई दिनों तक पेट भर खा सकती हूँ।”
मायावी ने पेड़ पर चढ़ने की कोशिश की, पर जैसे ही वह ऊपर चढ़ती, सारे पक्षी चिल्ला उठते और वह फिसल कर नीचे गिर जाती। कई बार कोशिश करने पर भी सफलता नहीं मिली। तब उसने चाल चली। वह पेड़ के तने से लिपट कर रोने लगी, “हाय! मैं अनाथ हूँ… कोई मेरा सहारा नहीं… अब तो मर जाऊँगी।”
बूढ़ा गिद्ध जरठ ऊँचे से सब सुन रहा था। उसने पूछा, “ऐ बिल्ली, तू रो क्यों रही है?” मायावी ने आँसुओं भरी आवाज में कहा, “मैंने जीवन भर हिंसा छोड़ दी है। अब केवल फल-फूल खाती हूँ। मैं यहाँ शरण माँगने आई हूँ। आप सब मुझे अपनी बहन मान लें।”
पक्षियों में से कुछ को दया आ गई। वे जरठ से बोले, “बाबा, इसे रहने दो। यह अब शाकाहारी है।” जरठ ने चेतावनी दी, “बिल्ली का स्वभाव नहीं बदलता।” पर पक्षी नहीं माने। आखिरकार जरठ ने कहा, “ठीक है, पर यह मेरे पास रहेगी, मेरी देखरेख में।”
मायावी अब दिन-रात जरठ के पास ही रहने लगी। वह उसकी सेवा करती, उसकी पीठ सहलाती, और जब जरठ सो जाता तो चुपके से एक-दो पक्षियों को पकड़ कर खा जाती। सुबह तक हड्डियाँ पेड़ के नीचे बिखेर देती। पक्षी डरने लगे। वे आपस में कहने लगे, “कोई हमें मार रहा है, पर कौन?”
जरठ को शक हुआ। एक रात उसने सोने का नाटक किया। मायावी ने जैसे ही एक छोटी चिड़िया को पकड़ने के लिए छलाँग लगाई, जरठ ने अपनी तेज चोंच से बिल्ली की पूँछ पकड़ ली और जोर से चीखा, “चोर पकड़ा गया!”
सारे पक्षी जाग गए। मायावी चिल्लाई, “मैंने कुछ नहीं किया!” जरठ ने उसकी पूँछ नहीं छोड़ी और बोला, “तेरे मुँह से अभी भी खून की बू आ रही है।” पक्षियों ने मिलकर बिल्ली को पेड़ से नीचे फेंक दिया। मायावी जान बचाकर भागी, पर उसकी पूँछ हमेशा के लिए टेढ़ी रह गई।
उस दिन के बाद पक्षियों ने फिर कभी किसी अजनबी पर जल्दी भरोसा नहीं किया।
नैतिक शिक्षा: दुष्ट स्वभाव वाला कितना भी मीठा बोल ले, उस पर कभी अंधा विश्वास न करें। सच्चाई को परखकर ही किसी को अपने बीच जगह दें।
