बुद्धिमान बंदर और ईर्ष्यालु हिरण

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एक सघन जंगल में, जहाँ नदियाँ चमकती थीं और पक्षियों की चहचहाहट गूँजती थी, एक बुद्धिमान बंदर रहता था, जिसका नाम था चतुर। चतुर अपनी समझदारी और सभी के साथ साझा करने की आदत के लिए प्रसिद्ध था। उसी जंगल में एक हिरण रहता था, जिसका नाम था जलन, जो दूसरों की सफलता से जलता था और हमेशा अपनी ताकत पर शेखी बघारता था।

एक दिन, जंगल में एक दुर्लभ फल का पेड़ अचानक उगा, जिसके फल इतने स्वादिष्ट थे कि उनकी खुशबू मीलों तक फैल गई। चतुर ने देखा कि यह पेड़ ऊँचा था, और उसने सोचा, “इस फल को सभी जानवरों के साथ बाँटना चाहिए।” उसने अपने दोस्तों—एक कबूतर (शांति) और एक गिलहरी (दौड़)—को बुलाया और कहा, “आइए, हम मिलकर फल तोड़ें और जंगल में बाँट दें।”

जलन, जो पास में खड़ा था, ने यह सुना और मन ही मन सोचा, “ये फल मेरी शान बढ़ाएँगे। मैं अकेले ही सब ले लूँगा!” उसने चतुर और उसके दोस्तों को धक्का देकर पेड़ की ओर दौड़ लगाई। लेकिन हिरण की टांगें पेड़ की ऊँचाई के लिए नहीं बनी थीं, और वह बार-बार फिसलकर गिर गया। चतुर ने हँसते हुए कहा, “जलन भाई, ताकत से सब कुछ हासिल नहीं होता। समझदारी और सहयोग जरूरी है।”

जलन गुस्से से लाल हो गया और बोला, “मैं खुद को साबित कर दूँगा!” उसने जोर से टक्कर मारी, लेकिन पेड़ हिला और फल ऊपर ही रहे। उधर, चतुर ने कबूतर शांति से फल तोड़ने के लिए ऊपर उड़ने और गिलहरी दौड़ से उन्हें नीचे लाने की योजना बनाई। दोनों ने मिलकर फल इकट्ठे किए और जंगल के सभी जानवरों में बाँट दिए, जिसमें जलन भी शामिल था।

जलन को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने चतुर से माफी माँगी और कहा, “मैंने ईर्ष्या में अंधा हो गया था। अब मैं भी सहयोग करूँगा।” अगले दिन से, जलन ने अपनी ताकत का इस्तेमाल जंगल की मदद के लिए किया और चतुर के साथ मिलकर काम करने लगा।

नैतिक शिक्षा: ईर्ष्या और अहंकार नुकसान पहुँचाते हैं; सहयोग और समझदारी से सुख मिलता है।

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