समय की धरोहर

गाँव में एक गरीब दादी माँ रहती थी। उनका खजाना था बचपन में नदी से मिला एक हरा पत्थर। शहर से लौटीं तो खजाना गायब। दुख से रोने लगीं। सहेलियों ने समझाया, “समय बदलता है, हम नहीं देते समय, वो खो जाता है। तेरा पत्थर खजाना था, पर तू वक्त नहीं दे पाई।” दादी माँ समझीं, संसाधनों की कद्र करो, भले छोटे हों। समय बदलेगा, पर उनका मूल्य नहीं। यही असली खजाना है।

नैतिक शिक्षा। अपने पास जो है, उसकी कद्र करें। हर संसाधन अनमोल है। वक्त बदलेगा, पर उन्हें संभालें, यही सच्चा धन है।

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