सच्ची जीत

एक छोटे से गाँव में रहने वाला एक लड़का, अर्जुन, बहुत ही मेहनती और ईमानदार था। उसका सपना था कि वह एक दिन एक बड़ा खिलाड़ी बने और अपने गाँव का नाम रोशन करे। लेकिन उसके गाँव के लोगों का मानना था कि गरीब घर का लड़का कभी बड़ा खिलाड़ी नहीं बन सकता। उनका कहना था, “गरीबों के लिए यह सपना देखना बेकार है।”

अर्जुन के पिता, रामू, एक मजदूर थे। वे अर्जुन के सपनों को समझते थे, लेकिन उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वे उसे खेल की ट्रेनिंग दिला सकें। अर्जुन की माँ, गीता, भी उसके सपनों का समर्थन करती थी, लेकिन वह भी समाज के डर से चुप रहती थी।

एक दिन, गाँव में एक नया कोच, मिस्टर सिंह, आया। वह बहुत ही प्रगतिशील सोच वाला था और बच्चों के सपनों को पूरा करने में विश्वास रखता था। अर्जुन ने मिस्टर सिंह को अपने सपने के बारे में बताया। मिस्टर सिंह ने अर्जुन की हिम्मत बढ़ाई और उसे बताया कि अगर वह मेहनत करे, तो उसका सपना जरूर पूरा हो सकता है।

मिस्टर सिंह ने अर्जुन को एक प्रतियोगिता के बारे में बताया, जिसमें जीतने वाले खिलाड़ी को खेल की ट्रेनिंग के लिए छात्रवृत्ति मिलती थी। अर्जुन ने उस प्रतियोगिता में भाग लेने का फैसला किया। उसने दिन-रात मेहनत की और अपने सपने को पूरा करने के लिए हर संभव प्रयास किया।

प्रतियोगिता के दिन, अर्जुन ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। उसने न केवल प्रतियोगिता जीती, बल्कि सभी का दिल भी जीत लिया। उसे छात्रवृत्ति मिली और वह खेल की ट्रेनिंग के लिए चला गया।

कुछ सालों बाद, अर्जुन एक सफल खिलाड़ी बन गया। वह अपने गाँव वापस आया और सभी को दिखाया कि अगर आप अपने सपनों पर विश्वास रखें और मेहनत करें, तो कुछ भी असंभव नहीं है।

नैतिक शिक्षा। सपने देखना और उन्हें पूरा करने के लिए मेहनत करना कभी भी गलत नहीं होता। चाहे समाज कुछ भी कहे, अगर आप अपने सपनों पर विश्वास रखें और उन्हें पूरा करने के लिए दृढ़ संकल्प रखें, तो आप जरूर सफल होंगे।

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