
एक दिन बादशाह अकबर अपने बाग़ में टहल रहे थे। उनके हाथ में एक बहुत प्यारी अंगूठी थी, जिसमें बड़ा लाल माणिक जड़ा हुआ था। अकबर उस अंगूठी को बहुत प्यार करते थे क्योंकि वह उनकी माँ की याद थी।
अचानक अंगूठी उंगली से फिसलकर घास में गिर गई। अकबर ने चारों तरफ़ देखा, पर अंगूठी कहीं नहीं मिली। उन्होंने तुरंत पहरेदारों और बाग़वानों को बुलाया। सबने घास छानी, फूलों की क्यारियाँ देखीं, फव्वारे के आसपास खोजा, लेकिन अंगूठी का नामो-निशान नहीं मिला।
अगले दिन दरबार में अकबर बहुत उदास बैठे थे। दरबारियों में फुसफुसाहट शुरू हो गई। कोई कह रहा था कि चोरी हो गई होगी, कोई किसी नौकर पर शक कर रहा था। माहौल बिगड़ने लगा।
बीरबल चुपचाप सब सुन रहे थे। फिर वे धीरे से बोले, “हुजूर, घबराइए मत। अंगूठी खोई नहीं है, बस थोड़ी शरारत हो गई है। मुझे थोड़ा समय दीजिए।”
बीरबल बाग़ में गए। उन्होंने ध्यान से देखा कि एक पेड़ पर महल का पालतू बंदर बार-बार कूद रहा है और अपनी पूँछ हिला-हिलाकर खुश हो रहा है। बीरबल मुस्कुराए। उन्होंने बाग़वान से कुछ मीठे फल मँगवाए और पेड़ के नीचे बैठ गए।
धीरे-धीरे बंदर नीचे आया। फल खाने लगा। तभी बीरबल ने उसकी एक उंगली पर चमकती हुई चीज़ देखी। वही बादशाह की अंगूठी थी! बंदर ने चमकदार अंगूठी को खिलौना समझकर अपनी उंगली में पहन लिया था और पेड़ पर ले जाकर छिपा रखा था।
बीरबल ने बहुत प्यार से बंदर को फल दिए और अंगूठी उसके हाथ से निकाल ली। फिर वे दरबार में लौटे और मुस्कुराते हुए अंगूठी अकबर के सामने रख दी।
अकबर हैरान रह गए, “बीरबल! यह तुमने कहाँ से ढूँढ़ी?”
बीरबल हँसे और बोले, “हुजूर, कभी-कभी खोई हुई चीज़ें ज़मीन पर नहीं, ऊपर पेड़ों पर छिपी होती हैं। बस ध्यान से देखना होता है।”
पूरे दरबार में हँसी की लहर दौड़ गई। अकबर ने राहत की साँस ली और बीरबल की पीठ थपथपाई।
नैतिक शिक्षा: जल्दी में किसी पर शक करने से पहले ध्यान से देखो और सोचो। छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देने से बड़े रहस्य भी हल हो जाते हैं।
