पेड़ पर चढ़ा न्याय

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एक दिन बादशाह अकबर के दरबार में दो आदमी आए। एक था गरीब किसान रामू, दूसरा था अमीर सेठ सुंदरलाल। दोनों के बीच एक बड़े बरगद के पेड़ को लेकर झगड़ा था।

रामू ने हाथ जोड़कर कहा, “जहाँपनाह, यह पेड़ मेरे दादाजी ने पैंतीस साल पहले लगाया था। आज यह फल देता है, छाया देता है और हमारे गाँव का सहारा है। पर सेठ जी कहते हैं कि यह उनकी ज़मीन पर है।”

सेठ सुंदरलाल ने गर्व से कहा, “हुजूर, कागज़ मेरे पास हैं। पेड़ मेरी सीमा के अंदर है। यह किसान झूठ बोल रहा है।”

अकबर ने दोनों के कागज़ देखे। कागज़ उलझे हुए थे। सीमा की रेखा साफ़ नहीं दिख रही थी। दरबार में सन्नाटा छा गया। अकबर ने बीरबल की ओर देखा।

बीरबल मुस्कुराए और बोले, “हुजूर, आज न्याय खुद पेड़ पर चढ़ेगा। आइए, हम सब उस बरगद के पास चलें।”

पूरा दरबार पेड़ के नीचे पहुँच गया। पेड़ बहुत ऊँचा और घना था। बीरबल ने अपनी पगड़ी ठीक की और कहा, “मैं खुद इस पेड़ पर चढ़ूँगा। ऊपर से सच्चाई साफ़ दिखेगी।”

सब हैरान रह गए। बीरबल धीरे-धीरे शाखाओं पर चढ़ने लगे। वे बहुत ऊपर पहुँचे। वहाँ से उन्होंने चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई। अचानक उनकी नज़र एक छोटी-सी चीज़ पर पड़ी। उन्होंने ज़ोर से आवाज़ दी, “सेठ सुंदरलाल! तुम्हारे आदमी अभी-अभी पेड़ के पीछे झाड़ियों में क्या छिपा रहे थे?”

सेठ घबरा गया। बीरबल ने नीचे उतरकर झाड़ियों से एक पुराना पत्थर निकाला। पत्थर पर रामू के दादा का नाम और साल खुदा हुआ था। साथ में एक छोटी सी निशानी भी थी जो सिर्फ परिवार वाले ही जानते थे।

बीरबल ने कहा, “यह पत्थर सीमा का असली निशान है। सेठ जी ने इसे छुपाने की कोशिश की थी। ऊपर से सब कुछ साफ़ दिख गया।”

अकबर ने ठहाका लगाया, “बीरबल! तुमने सच में न्याय को पेड़ पर चढ़ा दिया! आज सच्चाई ऊँचाई से आई।”

सेठ सुंदरलाल ने माफी माँगी। अकबर ने फैसला सुनाया कि पेड़ रामू का ही रहेगा और सेठ को गाँव के कुएँ की मरम्मत का खर्चा उठाना होगा।

बीरबल ने मुस्कुराते हुए कहा, “हुज़ूर, कभी-कभी सच्चाई ज़मीन पर नहीं, ऊँचाई पर छिपी होती है।”

नैतिक शिक्षा: सच्चा न्याय हमेशा ऊँचाई पर खड़ा होता है। वह धन और ताकत से ऊपर उठकर सच्चाई देखता है।

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