
एक रात महल के खजाने में से कई अनमोल रत्न गायब हो गए। पहरेदारों ने कहा, “जहाँपनाह, चोर बिल्कुल अंधेरे में आता है। कोई दीया नहीं जला होता, कोई आवाज़ नहीं आती। जैसे अंधेरा खुद ही चोर बन गया हो।”
बादशाह अकबर बहुत नाराज़ हुए। उन्होंने बीरबल को बुलाया और बोले, “बीरबल, यह चोर अंधेरे में छिपकर हमारा खजाना लूट रहा है। तुम्हें इसे पकड़ना होगा।”
बीरबल ने शांति से सिर झुकाया और कहा, “हुजूर, अंधेरा चोर का दोस्त है, लेकिन अगर समझदारी से इस्तेमाल किया जाए तो वही अंधेरा उसका दुश्मन भी बन सकता है। मुझे एक रात का समय दीजिए।”
अगली रात बीरबल ने एक चतुर योजना बनाई। उन्होंने खजाने के कमरे को पूरी तरह अंधेरा कर दिया। बीच में एक छोटी सी मेज़ पर बाकी बचे हुए रत्न रख दिए। फिर महल के सभी नौकरों, पहरेदारों और संदिग्ध लोगों को उसी अंधेरे कमरे में बुलाया। सबको घेरे में बैठा दिया।
बीरबल ने धीरे से कहा, “आज रात अंधेरा ही फैसला करेगा। जिसने चोरी की है, उसके हाथों पर एक अजीब ठंडक महसूस होगी। सब चुपचाप बैठे रहो।”
कमरा बिलकुल काला था। कोई साँस भी ज़ोर से नहीं ले रहा था। बीरबल खुद एक कोने में खड़े थे। थोड़ी देर बाद उन्होंने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, “अब सब अपनी हथेलियाँ सामने करो।”
फिर अचानक उन्होंने एक दीया जला दिया। रोशनी फैलते ही सबकी निगाहें एक आदमी पर ठहर गईं। वह आदमी रसोई का नौकर था। उसकी दोनों हथेलियों पर सफेद आटे के निशान साफ़ चमक रहे थे।
बीरबल ने मुस्कुराते हुए बताया, “मैंने रत्नों पर बारीक आटा छिड़क दिया था। अंधेरे में चोर ने रत्न छूए तो आटा उसके हाथों पर लग गया। अंधेरा उसके लिए छिपने का जगह बना, लेकिन वही अंधेरा उसकी पहचान भी बन गया।”
नौकर काँपते हुए कबूल कर गया। उसने कहा कि वह हर रात अंधेरे का फायदा उठाकर चोरी करता था क्योंकि उसे लगता था कि कोई नहीं देख पाएगा।
अकबर ने बीरबल की पीठ थपथपाई और बोले, “बीरबल, तुमने फिर साबित कर दिया कि कोई भी अंधेरा सच्चाई को हमेशा के लिए नहीं छिपा सकता।”
नौकर को हल्की सज़ा दी गई और उसे ईमानदारी का पाठ सिखाया गया। उस दिन से महल में कोई चोरी नहीं हुई।
नैतिक शिक्षा: अंधेरा गलत कामों को कुछ समय के लिए छिपा सकता है, लेकिन सच्चाई हमेशा रोशनी लेकर आती है।
