
एक दिन दरबार में एक घमंडी अमीर आदमी आया। उसका नाम था राव साहब। वह बहुत अकड़कर बोला, “जहाँपनाह, मैं शेर हूँ और बाकी सब लोग भेड़ें हैं। मेरी एक हिम्मत सौ आदमियों के बराबर है!”
दरबार में कुछ लोग हँसने लगे, कुछ चुप रह गए। अकबर की भौंहें थोड़ी सिकुड़ गईं। उन्होंने बीरबल की ओर देखा।
बीरबल मुस्कुराए और बोले, “हुजूर, राव साहब की बात बड़ी ऊँची है। अगर इजाज़त हो तो मैं एक छोटा-सा परीक्षण करना चाहता हूँ।”
अकबर ने सहमति दे दी। बीरबल ने हुक्म दिया कि महल के बाग़ में सौ भेड़ें लाई जाएँ। थोड़ी देर में बाग़ में सौ भेड़ें पहुँच गईं। वे इधर-उधर घास चर रही थीं।
बीरबल ने राव साहब से कहा, “राव साहब, आप शेर हैं। कृपया इन सौ भेड़ों को इकट्ठा करके एक सीध में खड़ा कर दीजिए। बस इतना सा काम।”
राव साहब ने छाती ठोककर कहा, “यह भी कोई काम है!”
वह भेड़ों के बीच गया और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा, “इधर आओ! रुक जाओ!” वह डंडा लेकर दौड़ा। भेड़ें डर के मारे चारों तरफ़ भागने लगीं। जितना वह चिल्लाया, उतनी ही भेड़ें बिखर गईं। राव साहब पसीने-पसीने हो गए, पर एक भी भेड़ उनके कहे अनुसार नहीं रुकी।
फिर बीरबल ने एक साधारण-से चरवाहे के लड़के को बुलाया जो भेड़ों के साथ आया था। लड़का सिर्फ़ बारह-तेरह साल का था। बीरबल ने कहा, “बेटा, इन भेड़ों को शांत करके एक जगह इकट्ठा करो।”
लड़का मुस्कुराया। उसने धीरे से सीटी बजाई, फिर धीरे-धीरे चलने लगा। भेड़ें उसकी आवाज़ पहचानती थीं। वे शांति से उसके पीछे-पीछे चल दीं और कुछ ही देर में एक सीध में खड़ी हो गईं। कोई शोर नहीं, कोई भागदौड़ नहीं।
दरबार के लोग हैरान रह गए। बीरबल ने राव साहब की ओर देखा और बोले, “राव साहब, शेर होने का मतलब सिर्फ़ चिल्लाना और डराता नहीं होता। असली शेर वह है जो शांति और समझदारी से काम लेता है। इन सौ भेड़ों के बीच यह छोटा-सा लड़का आज असली शेर निकला।”
अकबर ज़ोर से हँसे और बोले, “बीरबल, तुमने फिर कमाल कर दिया! घमंड की आवाज़ ऊँची होती है, पर असली ताकत शांत होती है।”
राव साहब का सर शर्म से झुक गया। उन्होंने माफी माँगी और उस दिन के बाद धीरे बोलना सीख लिया।
नैतिक शिक्षा: असली शेर वह नहीं जो सबसे ज़ोर से दहाड़ता है, बल्कि वह है जो शांति, समझदारी और हिम्मत से काम करता है।
