
एक दिन खजांची हड़बड़ाते हुए दरबार में आया और बोला, “जहाँपनाह, बड़ी मुश्किल हो गई है! शाही खजाना लगभग खाली हो चुका है। सोना-चाँदी बहुत कम बचा है।”
बादशाह अकबर की चिंता बढ़ गई। उन्होंने कहा, “खजाना खाली हो गया तो सिपाहियों को वेतन कैसे देंगे? गरीबों की मदद कैसे करेंगे?”
दरबारी एकदम घबरा गए। कोई बोला कि टैक्स बढ़ा दो, कोई बोला कि नए शुल्क लगा दो। माहौल तनावपूर्ण हो गया।
बीरबल शांति से आगे आए और बोले, “हुजूर, घबराने की ज़रूरत नहीं। खजाना खाली होना समस्या है, लेकिन इसे चतुराई से भरा जा सकता है। मुझे तीन दिन का समय दीजिए।”
अकबर ने सहमति दे दी।
बीरबल ने सबसे पहले महल के अंदर नज़र दौड़ाई। उन्होंने देखा कि महल में कई कमरों में पुराने महंगे तोहफे, अतिरिक्त सोने-चाँदी के बर्तन, और कभी इस्तेमाल न होने वाले सजावटी सामान पड़े हुए हैं। फिर उन्होंने रसोई, बाग़ और शाही अस्तबल का भी जायज़ा लिया। वहाँ भी बहुत-सी चीज़ें बेकार पड़ी थीं।
तीसरे दिन बीरबल ने दरबार में एक अनोखी योजना पेश की। उन्होंने कहा, “हुजूर, हम महल में ‘सादा जीवन सप्ताह’ मनाएँगे। एक हफ़्ते तक कोई अतिरिक्त शान-शौकत नहीं होगी। पुरानी और बेकार पड़ी कीमती चीज़ों को सही तरीके से बेचकर या बदलकर खजाने में डाल दिया जाएगा। साथ ही महल के सभी लोग सादा खाना खाएँगे और अनावश्यक खर्च बंद करेंगे।”
अकबर को बात अच्छी लगी। उन्होंने खुद भी सादे कपड़े पहने और सादा खाना खाया। बीरबल की निगरानी में पुरानी बेकार चीज़ों को सही भाव पर बेचा गया। महल के खर्च अचानक बहुत कम हो गए।
एक हफ़्ते बाद खजांची फिर आया। इस बार उसके चेहरे पर मुस्कान थी। उसने कहा, “जहाँपनाह, खजाना फिर से भरने लगा है! और लोगों में भी ख़ुशी है क्योंकि कोई नया टैक्स नहीं लगा।”
अकबर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने बीरबल की पीठ थपथपाई और बोले, “बीरबल, तुमने खाली खजाने को चतुराई से भर दिया, बिना किसी पर बोझ डाले। यही असली समझदारी है।”
नैतिक शिक्षा: पैसे की कमी होने पर हमेशा नए टैक्स बढ़ाने की ज़रूरत नहीं होती। समझदारी और बचत से भी खजाना भरा जा सकता है।
