बादशाह की थाली में जहर या शहद?

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एक दिन रसोई से एक खास मीठी थाली बादशाह अकबर के लिए आई। थाली में सुनहरा-सा हलवा सजा था, जिस पर शहद की बूँदें चमक रही थीं। अकबर ने मुस्कुराते हुए कहा, “आज तो खास स्वाद मिलेगा।”

तभी एक दरबारी ने अचानक चिल्लाकर कहा, “जहाँपनाह रुको। इस थाली में जहर हो सकता है।”

दरबार में सन्नाटा छा गया। सबकी निगाहें थाली पर टिक गईं। रसोइया काँपने लगा। अकबर की भौंहें सिकुड़ गईं। उन्होंने थाली से हाथ रोक लिया।

बीरबल शांति से आगे आए और बोले, “हुजूर, जहर या शहद — यह फैसला डर से नहीं, समझदारी से होना चाहिए।”

बीरबल ने थाली को ध्यान से देखा, उसकी खुशबू ली और फिर रसोइए से पूछा, “यह हलवा किस चीज़ से बना है?”

रसोइए ने बताया, “शुद्ध घी, आटा और जंगल का शुद्ध शहद।”

फिर बीरबल ने उस दरबारी की ओर देखा जो चिल्लाया था और मुस्कुराते हुए कहा, “अगर थाली में जहर है, तो आप पहले एक छोटा सा निवाला खाकर दिखाएँ। अगर आप तैयार हैं तो बादशाह भी खाएँगे।”

दरबारी का चेहरा फूला का फूला रह गया। वह पीछे हट गया और बोला, “मैं… मैं सिर्फ़ सावधानी बरत रहा था।”

बीरबल ने फिर रसोइए से कहा, “तुम खुद एक निवाला खाकर दिखाओ।”

रसोइए ने खुशी-खुशी हलवा खाया और बोला, “जहाँपनाह, यह शुद्ध शहद वाला हलवा है।”

बीरबल ने अकबर की थाली में से थोड़ा हलवा लिया, खुद चखा और फिर बादशाह की थाली में रख दिया। अकबर ने खाया तो उनका चेहरा खिल उठा। “वाह। सच में शुद्ध शहद का स्वाद है।”

फिर बीरबल ने धीरे से कहा, “हुजूर, कभी-कभी डर की अफवाह जहर बन जाती है। पर सच्चाई शहद की तरह मीठी होती है।”

अकबर ने ताली बजाई और उस दरबारी को चेतावनी दी कि बिना सोचे-समझे अफवाह न फैलाए। रसोइए को इनाम मिला और सबने मिलकर मीठा हलवा खाया।

नैतिक शिक्षा: बिना जाँचे-परखे किसी बात को जहर मत समझो। सच्चाई हमेशा शहद की तरह मीठी और साफ़ होती है।

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