
एक दिन अकबर के दरबार में बड़ी अजीब सी हलचल मच गई। पांच दरबारी अचानक पागलों जैसा व्यवहार करने लगे थे।
पहला दरबारी सिर्फ़ उल्टा बोलता था।
दूसरा दरबारी कुर्सी पर नहीं बैठता, बल्कि ज़मीन पर लेटकर बात करता था।
तीसरा दरबारी हर बात पर ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगता था, चाहे कोई बात हँसी की हो या नहीं।
चौथा दरबारी हर वाक्य के बाद “म्याऊँ” बोलता था।
और पाँचवाँ दरबारी एक पैर पर खड़ा होकर ही जवाब देता था।
दरबार का कामकाज ठप हो गया। अकबर बहुत नाराज़ हुए। उन्होंने बीरबल को बुलाया और कहा, “बीरबल, ये पाँचों पागल हो गए हैं क्या? इन्हें ठीक करो!”
बीरबल मुस्कुराए और बोले, “हुजूर, इन्हें सज़ा देने की ज़रूरत नहीं। बस एक छोटी सी अनोखी तरकीब से काम चल जाएगा।”
बीरबल ने पांचों दरबारियों को सामने बुलाया और कहा, “आप सब बहुत खास हैं। आज मैं आपमें से सबसे होशियार व्यक्ति चुनूँगा। इसके लिए एक छोटा सा काम है।”
फिर उन्होंने पहले दरबारी से कहा, “सीधा बोलकर बताओ कि दो और दो कितने होते हैं?”
वह उल्टा बोलने की आदत की वजह से कुछ साफ़ नहीं कह पाया।
दूसरे से कहा, “कुर्सी पर बैठकर यह कागज़ पढ़ो।”
वह ज़मीन पर लेटने की ज़िद की वजह से पढ़ ही नहीं पाया।
तीसरे से कहा, “बिना हँसे एक गंभीर बात बताओ।”
वह हँसते-हँसते गिर पड़ा।
चौथे से कहा, “म्याऊँ बोले बिना अपना नाम बताओ।”
वह बार-बार म्याऊँ कर बैठा।
पांचवें ने कहा, “दोनों पैरों पर खड़े होकर एक सीधी बात बोलो।”
वह एक पैर पर डगमगाते हुए गिरने ही वाला था।
बीरबल ने सबके सामने कहा, “देखा आपने! पागल बनने की कोशिश में आप साधारण काम भी नहीं कर पा रहे। असली अक्लमंदी पागल बनने में नहीं, सामान्य और समझदारी भरे व्यवहार में होती है।”
पांचों दरबारी शर्मिंदा हो गए। उन्होंने माफी माँगी और धीरे-धीरे अपना पागलपन छोड़ दिया। दरबार फिर से शांत और सुंदर हो गया।
अकबर हँसते हुए बोले, “बीरबल, तुमने बिना डांटे-फटकारे इन पाँचों को ठीक कर दिया। कमाल है!”
नैतिक शिक्षा: ध्यान खींचने के लिए पागलपन दिखाना समझदारी नहीं है। असली पहचान अच्छे और सामान्य व्यवहार से बनती है।
