
एक दिन दरबार में बड़ा विवाद चल रहा था। कुछ विद्वान दरबारी बीरबल से मुकाबला करना चाहते थे। उन्होंने बीरबल से कई कठिन सवाल पूछे। बीरबल ने सबके जवाब शांति और मुस्कान के साथ दिए।
आखिर में एक घमंडी विद्वान ने कहा, “बीरबल, तुम बहुत चतुर हो। अब तुम हमसे एक सवाल पूछो। तुम्हारा आखिरी सवाल क्या है?”
पूरा दरबार चुप हो गया। अकबर भी दिलचस्पी से देखने लगा।
बीरबल ने धीरे से सबकी ओर देखा और बोले, “मेरा आखिरी सवाल सिर्फ़ एक है — ‘जब तुम ग़लत होते हो, तो सबसे पहले किसकी बात मानते हो — अपनी या दूसरों की?’”
दरबार में सन्नाटा छा गया।
घमंडी विद्वान का चेहरा लाल हो गया। वह कुछ नहीं बोल पाया। दूसरे दरबारी भी सिर झुकाकर सोचने लगे। कोई जल्दी से जवाब नहीं दे रहा था।
अकबर ने मुस्कुराते हुए पूछा, “बीरबल, इस सवाल का जवाब क्या है?”
बीरबल ने विनम्रता से कहा, “जहाँपनाह, जवाब हर किसी के अंदर है। जो व्यक्ति ग़लत होने पर भी सिर्फ़ अपनी बात पर अड़ा रहता है, वह कभी नहीं सीखता। और जो दूसरों की सही बात को अपना लेता है, वही सच में अक्लमंद होता है। यही मेरे आखिरी सवाल का मतलब है।”
अकबर ने ताली बजाई। उन्होंने कहा, “यह आखिरी सवाल असल में सबसे पहला सबक है — खुद को सुधारने का।”
घमंडी विद्वान ने सिर झुकाया और बोला, “बीरबल जी, आज आपने हमें जीत लिया। आपका आखिरी सवाल हमारे दिल में रह जाएगा।”
उस दिन के बाद दरबार में लोग एक-दूसरे की बात ज़्यादा ध्यान से सुनने लगे।
नैतिक शिक्षा: सच्ची बुद्धिमानी इस बात में है कि जब हम ग़लत हों, तो अपनी जिद छोड़कर सही बात को स्वीकार कर लें।
