
एक गाँव में दो किसान रहते थे — रामू और श्यामू। दोनों में एक छोटे से खेत को लेकर झगड़ा चल रहा था। रामू कहता था कि खेत उसके दादा का है, श्यामू कहता था कि खेत उसके पिता का है। दोनों के पास पुराने कागज़ थे, लेकिन कोई भी साफ़ सबूत नहीं था।
एक दिन रामू कुएँ पर पानी लेने गया। उसके गले में एक पुरानी चाँदी का लॉकेट लटकता था, जिस पर उसके दादा का नाम खुदा था। अचानक लॉकेट की चेन टूट गई और लॉकेट कुएँ में जा गिरा।
रामू बहुत दुखी हो गया। वह बोला, “मेरी सच्चाई भी कुएँ में छिप गई।” लोग इकट्ठे हो गए, लेकिन कुआँ गहरा और अँधेरा था। कोई अंदर उतरने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।
बात बादशाह अकबर तक पहुँची। अकबर ने बीरबल से कहा, “बीरबल, इस झगड़े और कुएँ में गिरे सबूत का कुछ तो करो।”
बीरबल गाँव के कुएँ पर पहुँचे। उन्होंने ध्यान से कुएँ के अंदर झाँका। फिर उन्होंने एक लंबी रस्सी, एक छोटी टोकरी और एक जलता हुआ दिया लिया। दीये को सुरक्षित तरीके से टोकरी में बांधा और धीरे-धीरे कुएँ में उतारा। रोशनी से कुएँ का तला साफ़ दिखने लगा।
बीरबल ने एक लंबे बाँस में हुक लगाकर धीरे से लॉकेट को निकाल लिया। जब लॉकेट ऊपर आई तो उस पर साफ़-साफ़ रामू के दादा का नाम लिखा था।
बीरबल ने दरबार में लॉकेट दिखाई और बोले, “जहाँपनाह, सच्चाई कुएँ में छिपी थी। अब यह सबके सामने आ गई है।”
अकबर ने फैसला सुनाया कि खेत रामू का ही रहेगा। श्यामू ने भी सिर झुकाकर मान लिया।
रामू की आँखों में आँसू आ गए। उसने बीरबल के पैर छुए और कहा, “आपने मेरी सच्चाई कुएँ से निकाल दी।”
नैतिक शिक्षा: सच्चाई चाहे कितनी भी गहराई में छिप जाए, सही प्रयास और समझदारी से वह एक दिन ज़रूर सामने आती है।
