
एक दिन दरबार में एक रहस्यमयी बूढ़ा यात्री आया। उसके बाल सफ़ेद थे और आँखों में अजीब चमक थी। उसने अकबर को प्रणाम किया और बोला, “जहाँपनाह, मेरे पास तीन जादुई सवाल हैं। जो इनका सही जवाब देगा, वह सचमुच बुद्धिमान कहलाएगा।”
अकबर ने दिलचस्पी दिखाई और कहा, “पूछो अपने सवाल।”
बूढ़े ने पहला सवाल पूछा: “ऐसा क्या है जो जितना बाँटो, उतना ही बढ़ता जाता है?”
दरबारी सोच में पड़ गए। कोई बोला “पैसा”, कोई बोला “ज़मीन”। सब ग़लत थे।
बीरबल मुस्कुराए और बोले, “ज्ञान। ज्ञान जितना बाँटो उतना ही बढ़ता है। देने से कभी घटता नहीं।”
बूढ़े ने सिर हिलाया और दूसरा सवाल पूछा: “ऐसा क्या है जो सबके पास होता है, पर कोई उसे देख नहीं सकता?”
फिर से दरबार में सन्नाटा छा गया। कोई सही जवाब नहीं दे पाया।
बीरबल ने शांति से कहा, “मन। हर किसी के पास मन है, पर उसे कोई आँखों से नहीं देख सकता।”
बूढ़े की आँखें चमक उठीं। उसने तीसरा और आखिरी सवाल पूछा: “ऐसा क्या है जो तुम्हारा होकर भी ज्यादातर दूसरे लोग इस्तेमाल करते हैं?”
इस बार तो सब पूरी तरह चक्कर में पड़ गए।
बीरबल ने हल्के से मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “तुम्हारा नाम। नाम तुम्हारा होता है, पर पुकारते और इस्तेमाल करते हैं दूसरे ही लोग।”
बूढ़ा यात्री ज़ोर से हँस पड़ा। उसने कहा, “शाबाश बीरबल! तुमने तीनों जादुई सवालों के असली जवाब दिए। जादू सवालों में नहीं, तुम्हारी समझदारी में था।”
अकबर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने बीरबल की तारीफ़ की और बूढ़े यात्री को सम्मान के साथ विदा किया।
उस दिन के बाद दरबार में सब कहते थे — असली जादू बुद्धि का होता है।
नैतिक शिक्षा: असली जादू जादुई चीज़ों में नहीं, बल्कि साफ़ सोच और समझदारी में छिपा होता है।
