बादशाह की छड़ी और बीरबल की बुद्धि

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एक दिन बादशाह अकबर अपने हाथ में एक सुंदर शाही छड़ी लिए दरबार में बैठे थे। छड़ी सोने-चाँदी से जड़ी हुई थी और बहुत कीमती थी। अकबर ने अचानक कहा, “आज मैं तुमसे एक सवाल पूछता हूँ — इस छड़ी का सबसे अच्छा उपयोग क्या हो सकता है?”

दरबारी एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे। कोई बोला, “दुश्मनों को भगाने के लिए।” कोई बोला, “शिकार खेलने के लिए।” कोई बोला, “शाही शान बढ़ाने के लिए।”

बीरबल शांति से बोले, “हुजूर, अगर इजाज़त हो तो मैं छड़ी लेकर एक छोटा सा काम करके दिखाऊँ?”

अकबर ने छड़ी बीरबल को दे दी।

बीरबल छड़ी लेकर दरबार के बाहर बाग़ की तरफ़ गए। वहाँ एक छोटा बच्चा रो रहा था। उसका खिलौना पेड़ की ऊँची डाल पर फँस गया था। बीरबल ने शाही छड़ी से धीरे-धीरे डाल को झुकाया और बच्चे का खिलौना उतार दिया। बच्चा खुशी से मुस्कुरा दिया।

फिर बीरबल वापस दरबार में आए और छड़ी अकबर को लौटाते हुए बोले, “जहाँपनाह, इस छड़ी का सबसे अच्छा उपयोग यह है कि इससे किसी की मदद की जाए। ताकत तब सुंदर लगती है जब वह किसी को सुख पहुँचाए।”

अकबर की आँखें खुशी से चमक उठीं। उन्होंने कहा, “बीरबल, तुमने फिर अपनी बुद्धि से सबक सिखा दिया। छड़ी चाहे जितनी कीमती हो, उसकी असली कीमत उसके सही उपयोग में है।”

पूरे दरबार ने ताली बजाई। उस दिन के बाद लोग समझने लगे कि सच्ची ताकत मदद करने में होती है, दिखाने में नहीं।

नैतिक शिक्षा: ताकत और साधन तब महान बनते हैं जब उनका उपयोग दूसरों की मदद के लिए किया जाए।

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