
एक दिन अकबर के दरबार में एक दरबारी बहुत ज्यादा बोल रहा था। उसका नाम था चतुरसिंह। वह हर बात में अपनी टाँग अड़ा देता, दूसरों की बात काटता और छोटी-छोटी बातों को बढ़ा-चढ़ाकर सुनाता।
अकबर तंग आ गए। उन्होंने बीरबल से कहा, “बीरबल, इस चतुरसिंह को कोई ऐसी सज़ा दो कि उसे बोलने की आदत छूट जाए।”
बीरबल मुस्कुराए और बोले, “हुजूर, मैं इसे एक अनोखी सज़ा देता हूँ — चुप रहने की सज़ा।”
फिर उन्होंने चतुरसिंह से कहा, “आज से लेकर सूरज डूबने तक तुम्हें दरबार में एक शब्द भी नहीं बोलना है। अगर बोले तो सज़ा और बढ़ जाएगी।”
चतुरसिंह ने मजबूरन सिर हिलाया।
सुबह से ही मज़ा शुरू हो गया। कोई दरबारी ग़लत हिसाब लगा रहा था — चतुरसिंह का मन हो रहा था कि सही जवाब बताऊँ, पर मुँह बंद रखना पड़ा।
दोपहर में एक मज़ेदार किस्सा चल रहा था — वह हँसने के बजाय सिर्फ़ मुस्कुरा पाया।
शाम को एक आदमी ग़लत रास्ता बताने लगा — चतुरसिंह की जीभ में सवाल नाच रहे थे, पर वह चुप रहा।
जितना वह चुप रहा, उतना ही उसे अहसास होता गया कि बिना सोचे-समझे बोलना कितना बेकार होता है। सूरज डूबने तक उसका चेहरा शांत हो चुका था।
जब सज़ा का समय खत्म हुआ तो बीरबल ने पूछा, “कैसी लगी चुप रहने की सज़ा?”
चतुरसिंह ने विनम्रता से जवाब दिया, “बीरबल जी, यह सज़ा छोटी लगती थी, पर बहुत बड़ी सीख दे गई। अब मैं ज़रूरत पड़ने पर ही बोलूँगा।”
अकबर बहुत खुश हुए। उन्होंने कहा, “बीरबल, तुमने बिना डांटे सबसे अच्छी सज़ा दे दी।”
उस दिन के बाद चतुरसिंह कम बोलने लगा और लोग उसकी बात ज़्यादा ध्यान से सुनने लगे।
नैतिक शिक्षा: कभी-कभी चुप रहना सबसे बड़ी समझदारी होती है। ज़रूरत से ज़्यादा बोलने से बेहतर है सही समय पर सही बात कहना।
