
एक दिन दरबार में एक चोरी की शिकायत आई। एक व्यापारी का सोने का छोटा डिब्बा गायब हो गया था। शक एक नौकर पर था, लेकिन कोई सबूत नहीं था।
तभी एक छोटी सी बात सामने आई — चोरी के समय वहाँ एक गूंगा लड़का मौजूद था। वह लड़का बोल नहीं सकता था, पर उसने सब कुछ देख लिया था।
आरोपी नौकर ने हँसकर कहा, “जहाँपनाह, यह लड़का गूंगा है। यह क्या गवाही देगा? सच्चाई तो दब ही गई।”
अकबर थोड़ा चिंता में पड़ गए। तभी बीरबल आगे आए और बोले, “हुजूर, गूंगा गवाह भी सच्चाई बोल सकता है। बस सही तरीका चाहिए।”
बीरबल ने लड़के को पास बुलाया। उन्होंने ज़मीन पर कुछ चीज़ें रखीं — एक छोटा डिब्बा, एक रूमाल, एक टोपी और एक जूता। फिर उन्होंने लड़के से इशारों में कहा, “जो कुछ तुमने देखा, इन चीज़ों से बताओ।”
लड़का चुपचाप उठा। उसने पहले टोपी उठाकर आरोपी नौकर की तरफ़ बढ़ाई, फिर रूमाल से डिब्बे को ढकने का इशारा किया और आखिर में जूते से भागने का इशारा किया।
बीरबल ने सबके सामने समझाया, “देखिए, यह लड़का बता रहा है कि नौकर ने अपनी टोपी पहन रखी थी, रूमाल से डिब्बा छुपाया और फिर चुपचाप भाग गया।”
आरोपी नौकर का चेहरा पीला पड़ गया। वह कबूल कर गया।
अकबर हैरान रह गए। उन्होंने कहा, “बीरबल, तुमने गूंगे गवाह की सच्चाई को बोलते हुए दिखा दिया।”
लड़के की आँखों में खुशी चमक उठी। सच्चाई बिना एक शब्द बोले सबके सामने आ गई थी।
नैतिक शिक्षा: सच्चाई को बोलने के लिए हमेशा शब्दों की ज़रूरत नहीं होती। सही तरीका मिल जाए तो सच्चाई खुद बोल उठती है।
