
एक दिन दरबार में एक लंबा-सा पगड़ी पहने पंडित आया। वह बहुत अकड़कर चल रहा था। उसने अकबर को प्रणाम किया और बोला, “जहाँपनाह, मैं बहुत बड़े विद्वान हूँ। मुझे सभी शास्त्र कंठस्थ हैं। मैं भविष्य भी बता सकता हूँ और किसी के मन की बात भी पढ़ सकता हूँ।”
कुछ दरबारी प्रभावित हो गए। अकबर ने दिलचस्पी दिखाई और कहा, “अगर तुम सच में इतने बड़े पंडित हो तो अपनी विद्या दिखाओ।”
पंडित ने आँखें मूंदकर कुछ मंत्र पढ़े और बोला, “आज बादशाह को एक बड़ी खुशखबरी मिलने वाली है।”
बीरबल चुपचाप मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने अकबर से कहा, “हुजूर, अनुमति हो तो मैं भी इस पंडित जी से कुछ सवाल पूछूँ?”
अकबर ने हाँ कर दी।
बीरबल ने पहले सवाल में पूछा, “पंडित जी, सबसे शुद्ध पानी कौन सा होता है?”
पंडित ने जल्दी से जवाब दिया, “गंगा का जल।”
बीरबल ने फिर पूछा, “अगर गंगा में कोई गंदा पदार्थ गिर जाए तो क्या वह जल फिर भी शुद्ध रहेगा?”
पंडित घबरा गया और बोला, “हाँ… रहना चाहिए।”
बीरबल ने तीसरा सवाल पूछा, “पंडित जी, आपने कहा कि आप मन की बात पढ़ लेते हैं। बताइए, इस समय मेरे मन में क्या है?”
पंडित ने आँखें बंद कीं और नाटकीय अंदाज में बोला, “आप सोच रहे हैं कि मैं बहुत बड़ा विद्वान हूँ।”
बीरबल हँसे और बोले, “ग़लत! मैं सोच रहा था कि आप झूठे पंडित हैं। और अब सबको साबित भी कर दिया।”
फिर बीरबल ने एक साधारण सा सवाल किया जिसका जवाब कोई भी सचमुच का पढ़ा-लिखा व्यक्ति दे सकता था, लेकिन झूठा पंडित नहीं दे पाया। वह हकलाने लगा।
अकबर समझ गए कि यह व्यक्ति सिर्फ़ दिखावा कर रहा था। उन्होंने कहा, “बीरबल, तुमने फिर सही पकड़ लिया।”
झूठे पंडित ने माफी माँगी और वादा किया कि अब वह ईमानदारी से रहेगा। अकबर ने उसे माफ़ कर दिया, लेकिन चेतावनी दे दी कि विद्या का ढोंग करना ठीक नहीं है।
नैतिक शिक्षा: सच्ची विद्या दिखावे में नहीं, बल्कि व्यवहार और ईमानदारी में झलकती है। झूठ एक दिन ज़रूर पकड़ा जाता है।
