
एक दिन दरबार में हँसी-मज़ाक चल रहा था। अकबर ख़ुश मिज़ाज में थे। अचानक उन्होंने बीरबल से कहा, “बीरबल, आज हम तुमसे एक दांव लगाते हैं। अगर तुम हार गए तो तुम्हें पूरे दरबार के सामने नाचना होगा। और अगर तुम जीत गए तो हम तुम्हें एक खास इनाम देंगे।”
बीरबल मुस्कुराए, “हुजूर, दांव तो बताइए पहले।”
अकबर ने कहा, “हमारी शाही रसोई का ख़ास हलवाई बहुत घमंडी है। वह कभी अपनी गलती स्वीकार नहीं करता। दांव यह है कि तुम उसे आज उसकी एक छोटी सी गलती मनवा दो। बस एक बार ‘मैंने गलती की’ कहलवा दो।”
बीरबल ने दांव स्वीकार कर लिया।
दोपहर में जब हलवाई बादशाह के लिए खास मिठाई लेकर आया, तो बीरबल ने बहुत तारीफ़ की। फिर धीरे से बोले, “वाह! मिठाई तो कमाल की है… बस थोड़ी सी चीनी कम लग रही है।”
हलवाई तुरंत बिफर गया, “चीनी कम? मैंने तो बिल्कुल सही डाली है।”
बीरबल ने शांति से कहा, “अच्छा, तो फिर आप ही बताइए कि मिठाई में चीनी की सही माप क्या होनी चाहिए?”
हलवाई गर्व से अपनी माप बताने लगा। बीरबल ने उसी समय एक छोटी सी तराजू मंगवाई और मिठाई की चीनी तौलकर दिखाई। माप सच में थोड़ी कम थी।
हलवाई का चेहरा लाल हो गया। थोड़ी देर चुप रहने के बाद उसने सिर झुकाया और बोला, “जी… आज मैंने थोड़ी गलती कर दी।”
पूरे दरबार में हँसी गूँज उठी। अकबर ताली बजाते हुए बोले, “बीरबल, तुमने दांव जीत लिया! बिना डांटे, सिर्फ़ चतुराई से काम ले लिया।”
बीरबल ने विनम्रता से कहा, “हुजूर, दांव में जीतना उतना बड़ा नहीं होता जितना किसी को बिना शर्मिंदा किए सही बात मनवाना।”
अकबर ने खुशी-खुशी बीरबल को इनाम दिया और हलवाई को भी प्रोत्साहित किया कि गलती मानना बड़ी बात है।
नैतिक शिक्षा: गलती मानना कमजोरी नहीं, बल्कि बुद्धिमत्ता और ईमानदारी है। चतुराई से कही गई बात दिल तक पहुँच जाती है।
